न्यूनतम मजदूरी क्या है ? न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 (Minimum Wages Act, 1948)
वर्ग : न्यूनतम मजदूरी व विधि
प्रस्तावना
भारत का संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अंतर्गत समाज स्वतंत्र व समान माहौल प्रदान करने हेतु प्रतिबद्ध हैं सविधान सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक न्याय हेतु कटिबद्ध है। जहाँ समानता, स्वतंत्रता व समरसता मूल सिद्धांतो के आधार पर नागरिको के मानव अधिकारों की सुरक्षा दिए जाने का प्रावधान डॉ. अंबेडकर ने संविधान के निर्माण में पहले ही कर दिया है। संविधान नागरिकों को अपने जीवन यापन हेतु न्यूनतम जीविका का अधिकार सामाजिक, आर्थिक न्याय के अंतर्गत रखा गया है। न्यूनतम मजदूरी एक नागरिक को विधिक व आर्थिक अधिकार है।
न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wages)
यह परिभाषा न्यूनतम मजदूरी की बाध्यकारी प्रकृति को संदर्भित करती है, भले ही उन्हें ठीक करने की विधि की परवाह किए बिना। न्यूनतम मजदूरी कानून, एक प्रशासनिक अधिकारी के निर्णय, एक वेतन बोर्ड, एक वेतन परिषद, या औद्योगिक या श्रम अदालतों या न्यायधीशों द्वारा निर्धारित की जा सकती है।
सामूहिक समझौतों के प्रावधानों को विधि का बल देकर न्यूनतम मजदूरी भी निर्धारित की जा सकती है। न्यूनतम मजदूरी का उद्देश्य श्रमिकों को कम वेतन के विरुद्ध सुरक्षा देना है। सामान्य स्थिति में सभी को प्रगति के फल का एक न्यायसंगत और समान हिस्सा सुनिश्चित करने में मदद करते हैं, और उन सभी के लिए एक न्यूनतम जीविका मजदूरी है।
समान मजदूरी के कार्य के लिए समान पारिश्रमिक के अधिकार को बढ़ावा देकर, न्यूनतम मजदूरी भी एक नीति का एक तत्व हो सकती है, जिसमें गरीबी और असमानता को कम किया जा सकता है। न्यूनतम वेतन प्रणाली को अलगाव में देखा या इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन इसे अन्य सामाजिक और रोजगार नीतियों के पूरक और सुदृढ़ करने के लिए डिजाइन किया जाना चाहिए। रोजगार समर्थक नीतियों, सामाजिक हस्तांतरण और स्थायी उद्यमों के लिए सक्षम वातावरण बनाने सहित आय और श्रम बाजार की असमानता से निपटने के लिए कई प्रकार के उपायों का उपयोग किया जा सकता है।
न्यूनतम मजदूरी का उद्देश्य, जो एक मंजिल निर्धारित करता है, को सामूहिक सौदेबाजी से भी अलग किया जाना चाहिए, जिसका उपयोग मौजूदा मंजिल से ऊपर मजदूरी निर्धारित करने के लिए किया जा सकता है।
भारत में न्यूनतम मजदूरी दरें न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के तहत तय की गई हैं। चूँकि श्रम भारतीय संविधान के तहत एक समानान्तर विषय है, न्यूनतम मजदूरी दर केंद्र सरकार और प्रांतीय सरकारों दोनों द्वारा समय समय पर निर्धारित की जाती है।
भारत में न्यूनतम मजदूरी दरें राष्ट्रीय, राज्य, क्षेत्रीय और कौशल / व्यावसायिक स्तरों पर घोषित की जाती हैं। किसी भी क्षेत्र, व्यवसाय और क्षेत्र के लिए न्यूनतम मजदूरी दरें स्थापित की जा सकती हैं। इसके अलावा, प्रशिक्षित युवाओं व तटस्थ श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी की स्थापना की जाती है। न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण जीवनयापन की लागत को देखते हुए किया जाता है। मजदूरी की न्यूनतम दर में मजदूरी की मूल दर और रहने वाले भत्ते की लागत शामिल हो सकती है या जीवन निर्वाह भत्ते की लागत के साथ या बिना मजदूरी की एक मूल दर और रियायती दरों पर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के संबंध में रियायतों का नकद मूल्य (यदि अधिकृत हो); या मूल दर जीवन निर्वाह भत्ता की लागत और रियायतों के नकद मूल्य (यदि कोई हो) के लिए अनुमति देने वाला एक सर्व समावेशी दर मजदूरी की न्यूनतम दरों को तय या संशोधित करते समय एक समान अनुसूचित रोजगार में काम के विभिन्न वर्गों वयस्कों, किशोरों, बच्चों और प्रशिक्षित और विभिन्न इलाकों के अंतर्गत अलग अलग अनुसूचित रोजगारों के लिए मजदूरी की अलग-अलग न्यूनतम दरें तय की जा सकती हैं। न्यूनतम मजदूरी की दर, दिन, महीने या ऐसी किसी अन्य बड़ी मजदूरी अवधि के अनुसार निर्धारित की जा सकती है।
न्यूनतम मजदूरी का अर्थ है 'एक पारिश्रमिक की न्यूनतम राशि जो एक नियत अवधि के दौरान किए गए काम के लिए एक नियोक्ता को भुगतान करने के लिए आवश्यक है जो सामूहिक समझौते या एक व्यक्तिगत अनुबंध द्वारा कम नहीं किया जा सकता है'
यह परिभाषा विधि की परवाह किए बिना न्यूनतम मजदूरों की बाध्यकारी प्रकृति को संदर्भित करती है, न्यूनतम मजदूरी को कानून द्वारा निर्धारित किया जा सकता है सक्षम अधिकारी का निर्णय, वेतन बोर्ड, एक मजदूरी परिषद, या औद्योगिक या श्रम अदालतों या अधिकरणों द्वारा ।
सामूहिक समझौतों के प्रावधानों को विधि का बल देकर न्यूनतम मजदूरी भी निर्धारित की जा सकती है। न्यूनतम मजदूरी का उद्देश्य श्रमिकों को कम पारश्रमिक के खिलाफ सुरक्षा देना है। वे सभी के लिए प्रगति को फल का एक न्यायसंगत और समान हिस्सा सुनिश्चित करने में मदद करते हैं, और उन सभी के लिए एक न्यूनतम जीवित मजदूरी है जो इस तरह के संरक्षण में हैं।
समान मजदूरी के कार्य के लिए समान पारिश्रमिक के अधिकार को बढ़ावा देकर, गरीबी को दूर करने और पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता को कम करने के लिए न्यूनतम मजदूरी भी एक नीति का एक तत्व हो सकती है।
न्यूनतम वेतन प्रणाली को निष्ठापूर्वक नहीं देखा या इस्तेमाल किया जाना चाहिए, लेकिन इसे अन्य सामाजिक और रोजगार नीतियों के पूरक और सुदृढ़ करने के लिए तैयार किया जाना चाहिए। समर्थक रोजगार नीतियों, सामाजिक हस्तांतरण और स्थायी उद्यमों के लिए सक्षम वातावरण बनाने सहित आय और श्रम बाजार की असमानता से निपटने के लिए कई प्रकार के उपायों का उपयोग किया जा सकता है।
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 (Minimum Wages Act, 1948) भारत की संसद द्वारा पारित एक श्रम विधि है जो कुशल तथा अकुशल श्रमिकों को दी जाने वाली मजदूरी का निर्धारण करता है। यह अधिनियम सरकार को विनिर्दिष्ट रोजगारों में कार्य कर रहे कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने के लिए प्राधिकृत करता है। इसमें उपयुक्त अन्तरालों और अधिकतम पाँच वर्षो के अन्तराल पर पहले से निर्धारित न्यूनतम मजदूरियों की समीक्षा करने तथा उनमें संशोधन करने का प्रावधान है। केन्द्र सरकार अपने प्राधिकरण द्वारा अथवा इसके अर्न्तगत चलाए जा रहे किसी अनुसूचित रोजगार के लिए अथवा रिलवे प्रशासन में अथवा खदानों, तेल क्षेत्रों अथवा बढे बन्दरगाहों अथवा केन्द्रीय अधिनियम के अर्न्तर्गत स्थापित किसी निगम के संबंध में उपयुक्त एजेन्सी है। अन्य अनुसूचित रोजगार के संबंध में राज्य सरकारें, उपयुक्त सरकार हैं। केन्द्र सरकार का भवन एवं निर्माण कार्यकलापों जो अधिकतर केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग, रक्षा मंत्रालय आदि द्वारा संचालित किए जाते हैं, में तथा रक्षा एवं कृषि मंत्रालयों के अर्न्तगत कृषि फार्मों के साथ सीमित संबंध है। अधिकतर ऐसे रोजगार राज्य क्षेत्रों के अर्न्तगत आते हैं और उनके द्वारा ही मजदूरी निर्धारित/ संशोधित करना, तथा उनके अपने क्षेत्रों के अन्तर्गत आने वाले अनुसूचित रोजगार के संबंध में उनका कार्यान्वयन सुनिश्चित करना अपेक्षित होता है। केन्द्रीय क्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी का प्रवर्तन केन्द्रीय औद्योगिक संबंध तंत्र (सी.आई. आर.एम.) के जरिए सुनिश्चित किया जाता है। केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय क्षेत्र के अन्तगत 40 अनुसूचित रोजगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अर्न्तगत न्यूनतम मजदूरी निर्धारित की है। मुख्य श्रमायुक्त छः महीने के अन्तराल पर अर्थात् 1 अप्रैल और 1 अक्तूबर के प्रभाव से इसकी समीक्षा करने वाला वी. डी. ए. हैं।
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के तहत केंद्र और राज्य दोनों सरकारें अनुसूचित नियोजनों को अधिसूचित कर सकती हैं और इन अनुसूचित रोजगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी दरों को तय / संशोधित कर सकती हैं। अनुसूचित रोजगार में कृषि और गैर कृषि दोनों रोजगार शामिल हैं। केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को अनुसूची में किसी भी रोजगार (उद्योग क्षेत्र) को सूचित करने का अधिकार है, जहां कर्मचारियों की संख्या 1000 या अधिक है और उसमें कार्यरत कर्मचारियों के संबंध में न्यूनतम मजदूरी की दरों को तय करती है। केंद्र शासित क्षेत्र में 45 अनुसूचित नियोजनों के लिए न्यूनतम वेतन की घोषणा की जाती है, जबकि राज्य स्तर पर न्यूनतम वेतन हर राज्य द्वारा निर्धारित किया जाता है।
केंद्र सरकार की ओर से वेतन संहिता 2019 की अधिसूचना जारी होने के साथ ही देश के करीब 50 करोड़ मजदूरों को एकसमान न्यूनतम वेतन मिलने का रास्ता साफ हो गया है। श्रम सुधारों की दिशा में इसे बहुत बड़ा कदम बताया जा रहा है। इसके लागू होने के बाद देश के तमाम मजदूरों के एक निश्चित न्यूनतम वेतन से कम वेतन देना अपराध माना जाएगा, साथ ही एक समान काम के बदले एक जैसा वेतन देना भी जरूरी होगा। ये नया विधि पुराने श्रम कानूनों की जगह लेगा। तत्कालीन श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने 'कोड ऑन वेजेस' बिल को लोकसभा में 23 जुलाई 2019 को पेश किया था। इसके बाद 30 जुलाई को ये लोकसभा से और 2 अगस्त को राज्यसभा से पारित हुआ था। 8 अगस्त 2019 को इस पर राष्ट्रपति ने अपनी मंजूरी दे दी। इसके बाद हाल ही में सरकार की ओर से नोटिफिकेशन जारी होने के बाद ये देशभर में लागू हो गया। इस अधिनियम का उद्देश्य श्रम कानूनों में सुधार करने के साथ ही देश के तमाम श्रमिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना है। बिल पहली बार 10 अगस्त 2017 को लोकसभा में पेश हुआ था। इसके बाद 21 अगस्त, 2017- को यह बिल संसद की स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया। कमेटी ने 18 दिसंबर 2018 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। लेकिन 16वीं लोकसभा के भंग होने के कारण यह विधेयक पास नहीं हो पाया था। 'कोड ऑन वेजेस' बिल का मकसद सभी क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी को तय करना है, चाहे वो मजदूर उद्योग, व्यापार, निर्माण या अन्य किसी भी क्षेत्र का हो। अधिसूचना जारी होने के साथ ही ये विधेयक लागू हो गया और अब ये नया विधि चार पुराने कानूनों मजदूरी भुगतान विधि 1936, न्यूनतम मजदूरी विधि 1948. बोनस भुगतान विधि 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 की जगह लेगा।
कार्यक्षेत्र:
इस विधेयक के दायरे में निजी, सरकारी, संगठित और गैर-संगठित सभी तरह के क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारी आएंगे। रेलवे खदान, ऑइल जैसे क्षेत्रों से जुड़े कर्मचारियों के वेतन से जुड़े फैसले केंद्र सरकार लेगी। वहीं अन्य कर्मचारियों के मामलों में फैसले राज्य सरकारें लेंगी। मजदूरी में वेतन, भत्ते और मुद्रा के रूप में बताए गए अन्य सभी घटक शामिल रहेंगे। इसमें कर्मचारी की मिलने वाला बोनस या कोई यात्रा भत्ता शामिल नहीं होगा ।
1. अतिरिक्त समय:
केंद्र या राज्य सरकार सामान्य कार्य दिवस के लिए काम के घंटे तय कर सकती है। सामान्य कार्य दिवस के दौरान अगर कर्मचारी तय घंटों से ज्यादा काम करता है तो वो ओवरटाइम मजदूरी का हकदार होगा। अतिरिक्त कार्य के लिए उसे मिलने वाली मजदूरी की दर, आम दर के मुकाबले कम से कम दोगुनी होगी ।
2. न्यूनतम मजदूरी :
अधिनियम के मुताबिक केंद्र सरकार देशभर में न्यूनतम मजदूरी तय करने में आने वाली दिक्कतों को दूर करते हुए उसे मजदूरों के जीवनस्तर में सुधार करने लायक बनाएगी। साथ ही उसे अलग-अलग इलाकों के मुताबिक एक समान बनाया जाएगा। न्यूनतम वेतन तय करने के लिए ट्रेड यूनियनों, नियोक्ताओं और राज्य सरकार के प्रतिनिधियों की त्रिपक्षीय समिति बनेगी, जो देशभर में कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन तय करेगी।
3. समीक्षा प्रावधान :
नए अधिनियम के मुताबिक नियोक्ता अपने कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान नहीं कर सकता। वहीं न्यूनतम मजदूरी की राशि मुख्य तौर पर क्षेत्र और कुशलता के आधार पर काम के घंटे या वस्तु निर्माण की संख्या को देखते हुए तय की जाएगी। अधिनियम के मुताबिक हर पांच साल या उससे कम वक्त में केंद्र या राज्य सरकार द्वारा त्रिपक्षीय समिति के माध्यम से न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा और पुनर्निधारण किया जाएगा। इसे दय करने के दौरान कर्मचारी की कार्यकुशलता और काम की मुश्किलों जैसी बातों को भी ध्यान में रखा जाएगा।
4. कटौती :
नए अधिनियम में कर्मचारी को दिए जाने वाले वेतन में निम्न आधार पर कटौती का प्रावधान भी रखा गया है। जिसमें जुर्माना, ड्यूटी से अनुपस्थित रहना, नियोक्ता द्वारा दिए गए रहने के स्थान या कर्मचारी को दिए गए एडवांस के आधार पर वेतन कटौती की जा सकती है। हालांकि ये कटौती कर्मचारी के कुल वेतन के 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकती।
5. लैंगिक भेदभाव :
इस अधिनियम के जरिए लैंगिक आधार पर एक समान कार्य या एक प्रकृति वाले काम के लिए वेतन और भर्ती के मामले में लैंगिक भेदभाव को खत्म कर दिया गया है। अब एक जैसे काम के लिए महिलाओं को भी उतना ही वेतन मिलेगा जितना एक पुरुष को दिया जाता है।
6. मजदूरी का भुगतान :
विधेयक के मुताबिक कर्मचारियों को सिक्कों, करेंसी नोट, चेक, बैंक अकाउंट में ट्रांसफर या इलेक्ट्रॉनिक तरीके से मजदूरी का भुगतान किया जा सकता है। वहीं भुगतान का वक्त नियोक्ता द्वारा तय किया जाएगा जो कि रोजाना, साप्ताहिक पखवाड़े में या फिर मासिक हो सकता है। विधेयक में ये भी सुनिश्चित किया गया है कि मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को अगले महीने की 7 तारीख तक वेतन मिलेगा, साथ ही जो लोग साप्ताहिक आधार पर काम कर रहे हैं उन्हें हफ्ते के आखिरी दिन और दैनिक कामगारों को उसी दिन पारिश्रमिक मिलना सुनिश्चित होगा।
7. सजा का प्रावधान :
इस अधिनियम में नियमों का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के लिए जुर्माने तथा सजा का प्रावधान भी रखा गया है। न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी देने या अधिनियम के अन्य किसी अन्य प्रावधान का उल्लंघन करने पर उस पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगेगा। यदि पांच साल के दौरान वो दोबारा ऐसा करता है तो उसे 3 माह तक का कारावास और 1 लाख रुपए तक जुर्माना या दोनों तरह की सजा दी जा सकेगी।
8. समान्यतः
पांच तत्वों पर विचार करते हुए न्यूनतम मजदूरी को संशोधित किया जाता है: प्रति अर्जित तीन उपभोग इकाइयाँ, औसत वयस्क प्रति 2700 कैलोरी की न्यूनतम भोजन आवश्यकता, प्रति परिवार प्रति वर्ष 72 गज का कपड़ा, सरकार की औद्योगिक आवास योजना के तहत प्रदान किए गए न्यूनतम क्षेत्र के अनुरूप मकान किराया; कुल न्यूनतम वेतन का 20% का गठन करने के लिए ईंधन, प्रकाश और व्यय के अन्य विविध मदों और बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा की आवश्यकता, त्योहारों / समारोहों सहित न्यूनतम मनोरंजन और वृद्धावस्था, विवाह आदि के लिए प्रावधान, कुल न्यूनतम मजदूरी का 25% हिस्सा होना चाहिए।
अलग-अलग अंतराल पर न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा की जा सकती है, हालांकि ऐसे अंतराल पांच साल से अधिक नहीं हो सकते।
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण / संशोधन के दो तरीकों के लिए प्रदान करता है। समिति विधि के तहत, समितियों और उप-समितियों का गठन सरकार द्वारा जांच करने और न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण और संशोधन के संबंध में सिफारिशें करने के लिए किया जाता है। अधिसूचना पद्धति के तहत, सरकारी प्रस्तावों को प्रभावित करने की संभावना वाले व्यक्तियों की सूचना के लिए सरकारी राजपत्र में प्रकाशित किया जाता और एक तारीख निर्दिष्ट करता है, जिस पर प्रस्तावों को ध्यान में रखा जाएगा।
मुद्रास्फीति प्रभावों के खिलाफ वास्तविक मजदूरी की रक्षा करने में, केंद्र सरकार औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में परिवर्तनीय महंगाई भत्ते को जोड़ने का प्रावधान करती है। अधिकांश राज्य न्यूनतम मजदूरी को संशोधित करने में परिवर्तनीय महंगाई भत्ता प्रदान करते हैं।
श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी के भुगतान सहित श्रम विधि का अनुपालन श्रम निरीक्षकों द्वारा सुनिश्चित किया जाता है, जैसा कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 की धारा 19 के तहत नियुक्त किया जाता है। गैर-अनुपालन, जुर्माना, कारावास और बकाया के भुगतान के रूप में लागू किया जा सकता है। प्रति विधि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम की धारा 22 में कहा गया है कि उल्लंघन करने वालों को जुर्माना या कारावास की सजा दी जा सकती है, जो छह महीने या दोनों की अवधि तक बढ़ सकती है। प्राधिकरण (मजिस्ट्रेट) को बकाया वेतन के भुगतान में देरी के लिए मुआवजे के साथ श्रमिक को बकाया भुगतान की भी आवश्यकता हो सकती है। हालांकि, इस तरह का अतिरिक्त मुआवजा देय राशि से 10 गुना से अधिक नहीं होना चाहिए। इसी तरह, एक नियोक्ता जो विधि के तहत आवश्यक के रूप में रजिस्टर या रिकॉर्ड बनाए रखने में विफल रहता है, 500 रुपये तक के जुर्माना के लिए उत्तरदायी है। अतः न्यूनतम मजदूरी एक अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
वेतन संहिता अधिनियम, 2019
केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय (The Union Labour and Employment Ministry) द्वारा 'वेतन संहिता अधिनियम', 2019 (Wages Code Act, 2019) के कार्यान्वयन के लिये तैयार किया।
वेतन सहिता अधिनियम : महत्वपूर्ण पहलू
वेतन संहिता अधिनियम, 2019 सभी को न्यूनतम मजदूरी की गारंटी प्रदान करता है। मजदूरी की गणना कैसे की जाये तथा सभी राज्यों के लिये एक समान मजदूरी भुगतान का निर्धारण किस प्रकार किया जाए, संसद द्वारा इसे अगस्त, 2019 में पारित कर दिया गया था, इससे देश में लगभग 50 करोड़ कामगारों को लाभ मिलेगा वेतन संहिता, श्रम सुधारों का हिस्सा है और केंद्र सरकार द्वारा इस दिशा में उठाये गये कदम के तहत पहला विधि है।
केंद्र सरकार 44 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार संहिता में समाहित करने की दिशा में कार्य कर रही है, जिनमें शामिल हैं-
1. मजदूरी संहिता
2. औद्योगिक संबंध
3. सामाजिक सुरक्षा
4. व्यावसायिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा संहिता
विशेषताएं:
* वेतन संहिता अधिनियम-2019 में मजदूरी, बोनस और उससे जुड़े मामलों से संबंधित विधि को संशोधित और एकीकृत किया गया है।
* इस संहिता में चार श्रम विधि को समाहित किया जाएगा, यह अधिनियम न्यूनतम मजदूरी विधि 1948 (Minimum Wages Act, 1948), मजदूरी भुगतान विधि 1936 (Payment of Wages Act, 1936), बोनस भुगतान विधि 1965 (Payment of Bonus Act, 1965), समान पारितोषिक विधि 1976 (Equal Remuneration Act, 1976) का स्थान लेगा।
* विधेयक में प्रावधान है कि केंद्र सरकार रेलवे और खनन समेत कुछ क्षेत्रों के लिये न्यूनतम मजदूरी तय कर सकती है जबकि राज्य अन्य श्रेणी के कर्मचारियों के लिये न्यूनतम मजदूरी तय करने को स्वतंत्र हैं।
* संहिता में राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने का प्रावधान है।
* केंद्र सरकार विभिन्न क्षेत्रों या राज्यों के लिये अलग से न्यूनतम वेतन निर्धारित कर सकती है।
* विधि के मसौदे में यह भी कहा गया है कि न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा हर पांच साल में की जाएगी |
* वेतन संहिता अधिनियम 2019 में पूरे देश में एक समान वेतन एवं उसका सभी कर्मचारियों को समय पर भुगतान किये जाने का प्रावधान किया गया है।
* इस संहिता में न्यूनतम मजदूरी का आकलन न्यूनतम जीवन-यापन की स्थिति के आधार पर किये जाने का प्रावधान है।
* वेतन संहिता अधिनियम-2019 में आठ घंटे कार्य करने का प्रावधान किया गया है परंतु ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि 'लॉकडाउन' के दौरान कुछ राज्यों में उत्पादन में हुए नुकसान की भरपाई के लिये कामकाजी घंटे बढ़ाए जा सकते हैं।
* दैनिक आधार पर, न्यूनतम वेतन की गणना करने के लिये मानक श्रमिक परिवार वर्ग, जिसमे कामगार के अलावा उसकी पत्नी या उसका पति और दो बच्चें शामिल हो।
* इसके अंतर्गत विशेष प्रावधान किये जाने हेतु सिफारिश है की मानक श्रमिक परिवार वर्ग द्वारा प्रति वर्ष 66 मीटर कपडे का प्रयोग!, आवासीय किराया व्यय जो भोजन और वस्त्र व्यय का 10 प्रतिशत होगा।, ईंधन, बिजली, और व्यय की अन्य विविध मदें जो न्यूनतम मजदूरी की 20% होंगी और बच्चों की शिक्षा पर व्यय, चिकित्सा आवश्यकताएँ, मनोरंजन और अन्य आकस्मिक व्यय जो न्यूनतम मजदूरी का 25 प्रतिशत होगा ।
वर्तमान समय में मजदूरी के संदर्भ में विभिन्न श्रम कानूनों को अलग-अलग रुप में परिभाषित किया गया है, जिसके चलते इनके क्रियान्वयन में काफी कठिनाई के साथ कानूनी विवाद भी बढ़ जाता है। संहिता में विभिन्न श्रम कानूनों को सरलीकृत किया गया है जिससे इस बात की संभावना अधिक प्रबल होती है कि इससे कानूनी विवादों को कम करने में मदद मिलेगी इसके अलावा नियुक्तिकर्ता के लिये अनुपालन लागत भी कम होगी।