लोक नीति निर्माण में गैर-संवैधानिक घटकों की भूमिका Non-Constitutional Factors of Policy Making

नीति निर्माण के गैर-संवैधानिक घटक Non-Constitutional Factors of Policy Making

परिचय (Introduction)

भारत के संसदीय लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका को नीति निर्माण के लिए प्रमुख संवैधानिक घटक के रूप में जाना जाता है। हालांकि इनके पीछे कई महत्वपूर्ण संस्थाएँ एवं कार्यालयों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है तथा प्रशासनिक योगदान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। तदोपरान्त भी कुछ ऐसी संस्थाएँ एवं घटक हैं जो असंवैधानिक होते हुए भी नीति-निर्माण को प्रभावित करते हैं। ये असंवैधानिक घटक नीति-निर्माण को आधार, दिशा एवं मार्गदर्शन देने का कार्य करते हैं, जिससे इनकी उपयोगिता स्वयंसिद्ध है। नीति निर्माण के गैर संवैधनिक घटकों को प्रमुख रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है-सरकारी घटक और गैर-सरकारी घटक ।


वाह्य घटक (External Factors)

भारत में नीति निर्माण के संवैधानिक एवं गैर-संवैधानिक घटकों के अलावा कुछ वाह्य घटक भी विद्यमान हैं जो नीति को प्रभावित करते हैं। इनमें प्रमुख रूप से संयुक्त राष्ट्र संघ (U.NO.) और इससे 1E2»v Hdj.k(W.H.O., I.L.O., U.N.D.P, U.N.E.P) तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (I.M.F.), विश्व बैंक (World Bank), आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (Economic Cooperation and Development Organization) आदि हैं। किसी देश की नीति को उसके चारों ओर का वातावरण प्रभावित करता है जिसमें पड़ोसी देशी विदेशी संबंध, विचारधारा एवं प्रतिबद्धता भी प्रभावित करती है।

योजना आयोग की भूमिका (Role of Planning Commission)

देश में स्वतंत्रता के पश्चात् आर्थिक विकास के लिए आर्थिक नियोजन की अवधारणा पर ध्यान दिया गया जिसके फलस्वरूप 'योजना आयोग' एवं 'राष्ट्रीय विकास परिषद्' जैसे निकाय अस्तित्व में आए। योजना आयोग एक गैर-संवैधानिक निकाय है जिसकी स्थापना 15 मार्च, 1950 को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने एक संकल्प पारित करके की। इसमें मंत्रिमण्डल ने योजना आयोग को सलाहकारी संस्था के रूप में माना था। नियोजन के उद्देश्यों में आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक पहलुओं को ध्यान में रखा गया। योजना आयोग के निर्माण के समय यह ध्यान में रखा गया कि राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों में अपेक्षित सामाजिक-आर्थिक रूपान्तरण लाने में राज्यों को महती भूमिका का निर्वहन करना होगा। योजना आयोग देश के विकास का खाका बनाने अर्थात् पंचवर्षीय योजनाएँ एवं वार्षिक योजनाएँ बनाते समय भारत सरकार के मंत्रालयों और राज्य सरकारों से परामर्श करेगा।

योजना आयोग द्वारा निर्मित योजनाएँ वैधानिक नहीं होती हैं और इसकी भूमिका भी एक परामर्शदाता निकाय (Advisory Body) के रूप में होती है परन्तु व्यावहारिक स्थिति अधिक सुदृढ़ होती है। वैसे तो योजना आयोग का स्वरूप एवं संगठन समय-समय पर बदलते रहे हैं परन्तु देश का प्रधानमंत्री इसका पदेन अध्यक्ष होता है जिससे इसकी महत्ता स्वयं बढ़ जाती है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सभी महत्वपूर्ण नीति विषयक मामलों पर विचार-विमर्श होता है और आवश्यक दिशा-निर्देश भी प्राप्त होते रहते हैं। योजना आयोग का उपाध्यक्ष पूर्णकालिक होता है जिसका दर्जा केबिनेट मंत्री का होता है, यद्यपि वह अनिवार्यतः मंत्रिपरिषद् का सदस्य नहीं होता है। योजना आयोग में पूर्णकालिक एवं अंशकालिक सदस्य होते हैं। सभी पूर्णकालिक सदस्यों को केन्द्रीय राज्यमंत्री का दर्जा दिया जाता है। इसके सदस्यों में कुछ महत्वपूर्ण केबिनेट मंत्री, ख्यातनाम प्रतिष्ठित विशेषज्ञ सदस्य (आर्थिक, कृषि, विज्ञान, ऊर्जा, शिक्षा, संचार, तकनीकी, चिकित्सा, प्रशासक आदि) राष्ट्रीय ज्ञान आयोग, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद्, जनसंख्या स्थिर कोष तथा सदस्य सचिव आदि सदस्य के रूप में होते हैं। वर्तमान में इसमें विषयानुसार 34 संभाग, 98 कार्यदल एवं 23 स्टीयरिंग कमेटियाँ हैं। योजना आयोग का प्रत्येक सदस्य अपने विषयों के एक निश्चित कार्य क्षेत्र को देखता है तथा ये सदस्य पंचवर्षीय और वार्षिक योजनाओं के दस्तावेज तैयार करने में आयोग के विषय प्रभागों को आवश्यक सलाह और दिशा-निर्देशन देने का काम करते हैं।

योजना आयोग योजना निर्माण से पूर्व लक्ष्यों एवं उद्देश्यों का निर्धारण करता है, जो कि प्राप्त किये जाने हैं जैसे आर्थिक विकास, साक्षरता, आयवृद्धि, जनसंख्या स्थिरीकरण आदि । तदोपरान्त उस योजना को स्तरों में विभाजित कर समय सीमा का निर्धारण किया जाता है जिसमें लक्ष्य प्राप्त किये जाने होते हैं। इस हेतु उपलब्ध संसाधनों का आंकलन किया जाता है और इन उपलब्ध संसाधनों द्वारा बेहतर उपयोग करते हुए अधिकतम लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कार्यनीति का निर्धारण किया जाता है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है-


योजना आयोग निष्पादित योजनाओं की प्रगति को ध्यान में रखते हुए उसके क्रियान्वयन एवं निष्पादन में आ रही समस्याओं की पहचान करता है और उसके सफल निष्पादन के लिए आवश्यक सुझाव एवं उपाय प्रस्तुत करता है। साथ ही योजना आयोग विभिन्न योजनाओं का मूल्यांकन, मॉनीटरिंग एवं विश्लेषण का कार्य भी करता है। उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि योजना आयोग गैर-संवैधानिक निकाय होने के उपरान्त भी नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

राष्ट्रीय विकास परिषद् (National Development Council)

भारत में योजना से सम्बद्ध मामलों में 'राष्ट्रीय विकास परिषद्' केन्द्र तथा राज्यों के मध्य समन्वयात्मक भूमिका का निर्वहन करती है जिसकी स्थापना 6 अगस्त, 1952 में की गई। 'सहकारी संघ व्यवस्था' में केन्द्र सरकार शक्तिशाली तो होती है परन्तु राज्य सरकारें भी अपने क्षेत्र में कमजोर नहीं होती हैं। इस व्यवस्था का प्रमुख लक्षण दोनों प्रकार की सरकारों की एक-दूसरे पर निर्भरता है (ऑस्टिन ग्रेनविल, दी इण्डियन कॉन्स्टीट्यूशन, 1968, पृ. 186 )।

 
राष्ट्रीय विकास परिषद् के गठन के पीछे निम्नलिखित तीन प्रमुख उद्देश्य हैं-
1. योजना की सहायता के लिए राष्ट्र के स्रोतों तथा परिश्रम को सुदृढ़ करना तथा उनको गतिशील करना।

2. सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में समरूप आर्थिक नीतियों को अपनाने को प्रोत्साहित करना ।

3. देश के सभी भागों के तीव्र तथा सन्तुलित विकास के लिए प्रयास करना ( एस. आर. माहेश्वरी, 1968, इण्डियन एडमिनिस्ट्रेशन, पृ. 97 ) 1

राष्ट्रीय विकास परिषद् भी योजना आयोग की तरह गैर संवैधानिक निकाय है। राष्ट्रीय विकास परिषद् का अध्यक्ष भी प्रधानमंत्री होता है और योजना आयोग का सचिव ही परिषद् का सचिव होता है। राष्ट्रीय विकास परिषद् का सदस्यीय आकार योजना आयोग की तुलना में विस्तृत एवं व्यापक होता है जिसे निम्न चार्ट द्वारा समझा जा सकता है-


राष्ट्रीय विकास परिषद् की छह समितियाँ हैं यथा जनसंख्या समिति, अनुसूचित जाति अत्याचार समिति, रोजगार समिति, चिकित्सा समिति, शिक्षा समिति तथा साक्षरता एवं योजना विकेन्द्रीकरण समिति। ये समितियाँ अपने-अपने विषय क्षेत्र में रहकर नीतिगत मार्गदर्शन करती हैं। भारत में मंत्रिमण्डल को नीति निर्माण का प्रमुख केन्द्र माना जाता है। राष्ट्रीय विकास परिषद् के परिप्रेक्ष्य में नीति-निर्माण की भूमिका का आंकलन करते समय स्पष्टतः कहा जा सकता है कि इसकी भूमिका सर्वोपरि होती है क्योंकि एक तो केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के सभी सदस्य एन.डी.सी. के सदस्य होते हैं, दूसरा सरकार या शासन के राजनीतिक शीर्ष पर प्रधानमंत्री होता है, यहाँ भी प्रधानमंत्री इसका अध्यक्ष होता है। तीसरे राष्ट्रीय विकास परिषद् में ज्ञान, अनुभव एवं योग्यता के हिसाब से योजना आयोग के विशेषज्ञ सदस्य भी इसमें सम्मिलित होते हैं। चौथी बात है कि योजना आयोग का सचिव ही राष्ट्रीय विकास परिषद् का सचिव होता है। पांचवी महत्वपूर्ण बात है कि राष्ट्रीय विकास परिषद् में सभी राज्यों (28 राज्य) एवं केन्द्रशासित प्रदेशों (7) के प्रतिनिधि सदस्य के रूप में सहभागी होते हैं अर्थात् राष्ट्रीय विकास परिषद् में पूरा केन्द्रीय मंत्रिमण्डल, योजना आयोग के विशेष सदस्य एवं राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में किसी नीति से सम्बन्धित अपना पक्ष रखने का अवसर प्राप्त होता है। इससे ऐसा लगता है मानो देश का समग्र इसमें शामिल है। इसलिए राष्ट्रीय विकास परिषद् को एक 'सर्वोपरि केबिनेट' (Super Cabinet) कहा जाता है।

श्री एच. एम. पटेल ( Sh. H.M. Patel) ने कहा कि योजना आयोग के मन्त्रिमण्डलों में से 'राष्ट्रीय विकास परिषद्' एक है। "राष्ट्रीय विकास परिषद् स्पष्टतः योजना आयोग से उच्च निकाय हैं। वस्तुत: यह एक नीति-निर्माता निकाय है और इसकी सिफारिशें केवल सुझाव मात्र नहीं हैं बल्कि ये तो नीति सम्बन्धी निर्णयों के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं मानी जा सकती" (एच. एम. पटेल, 1960, रिव्यू ऑफ दी आर्गेनाइजेशन ऑफ दी गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया, पृ. 460 ) । योजना सम्बन्धी मामलों में केन्द्र तथा राज्यों के मध्य समायोजन की स्थापना के लिए राष्ट्रीय विकास परिषद् की स्थापना की गयी (सी.पी. भाम्भरी, 1976, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन इन इण्डिया, पृ. 88-91 ) 1

राष्ट्रीय विकास परिषद् संविधानेत्तर संस्था होते हुए भी व्यवहार में मंत्रिमण्डल एवं संसद से भी अधिक प्रभुत्वशाली नजर आती है। यह नीति-निर्माता निकाय के रूप में उभर कर आयी है। व्यवहार में इसके सुझाव 'नीति निदेशक' बन गये हैं जिनका पालन न केवल राज्यों के मंत्रिमण्डल करते हैं अपितु हमारी संसद को भी करना होता है। ऐसा कहा जाता है कि एन.डी.सी. ने तो योजना आयोग को भी पीछे छोड़ दिया है और उसका दर्जा मात्र शोध संस्थान में परिवर्तित कर दिया गया है (नॉरमन डी. पामर, 1970, दी इण्डियन पॉलिटिकल सिस्टम, पृ. 190-191) 1 के. संथानम ने राष्ट्रीय विकास परिषद् की भूमिका का विश्लेषण करते हुए इसे सर्वोच्च मंत्रिमण्डल की संज्ञा दी है और उन्हीं के शब्दों में "राष्ट्रीय विकास परिषद् की स्थिति लगभग वैसी ही है जैसी कि पूरे भारतीय महासंघ के सुपर मंत्रिमण्डल (Super Cabinet ) की एक ऐसा मंत्रिमण्डल जो केन्द्र सरकार और सभी राज्यों की सरकारों की ओर से कार्य करता है"।



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