लोक नीति निर्माण के गैर-संवैधानिक गैर-सरकारी घटक (Non-constitutional Nongovernmental Factors of Public Policy Making)
इस अध्याय में 'लोक नीति निर्माण के गैर-संवैधानिक घटकों का विस्तृत उल्लेख किया गया है। योजना आयोग एवं राष्ट्रीय विकास परिषद् गैर-संवैधानिक परन्तु सरकारी घटक हैं, अब हम गैर-संवैधानिकता के साथ-साथ गैर-सरकारी घटकों की बात करने जा रहे हैं जिनमें प्रमुख रूप से लोक नीति निर्माण को प्रभावित करने वाले तत्व हैं- राजनैतिक दल, दबाव समूह, हित समूह, व्यक्तिगत नागरिक, जनसम्पर्क माध्यम और गैर-सरकारी संस्थाएँ (NGOs) आदि । '
राजनीतिक दल (Political Parties)
राजनीतिक दल ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जो किसी राष्ट्रीय हित की पूर्ति के लिए किसी एक विशेष सिद्धान्त को आधार मानकर अपना संगठन बनाते हैं (बर्क, 1970, थॉट्स ऑन द कॉसेज ऑफ प्रेसेन्ट डिस्कन्टेन्ट्स, पृ. 16)। राजनीतिक दल अपनी गतिविधियों के माध्यम से सत्तारूढ़ या शासन तंत्र पर अपना नियंत्रण एवं प्रभाव बनाये रखने की दिशा में कार्य करता है, जिससे सत्तारूढ़ है (मैकाइवर, द वेब ऑफ गवर्नमेन्ट, पृ. 122 ) दल या शासन पर नीति या सिद्धान्तों को अपने पक्ष में करने का अवसर मिलने की सम्भावना रहती है । । भारत में संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया गया है जिसमें सभी को समान रूप से अधिकार प्राप्त हैं चाहे वे चुनाव लड़ने से सम्बन्धित हों अथवा राजनीतिक दल के गठन से सम्बद्ध हों। यहाँ राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता के लिए लोकसभा या विधानसभा चुनाव में चार या अधिक राज्यों में कुल वैध मतों के 6 प्रतिशत प्राप्त हो तथा किसी राज्य अथवा राज्यों में लोकसभा की चार सीटों पर जीत दर्ज की हो या लोकसभा की कुल निर्वाचन सीटों का 2 प्रतिशत अर्थात् 11 स्थान प्राप्त हों। इसी प्रकार राज्य स्तरीय दल के रूप में मान्यता के लिए राजनीतिक दल को विधानसभा या लोकसभा चुनाव में कुल वैध मतों के 6 प्रतिशत प्राप्त करना आवश्यक है। विधानसभा में उसको कम से कम 2 सीटें प्राप्त हों या विधानसभा सीटों के 3 प्रतिशत पर विजय प्राप्त की हो या तीन सीटें जीती हों।
भारत में पन्द्रहवीं लोकसभा में राजनीतिक दल रहे कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, माकपा, बसपा, भाकपा, राकांपा, सपा, राजद, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, शिवसेना, बीजद, जद (यू), शिअद पी. एम.के., टी.डी.पी., झाझुमो, ए.डी.एम. के, जद (स), शलोद, आर. एस. पी., फारवर्ड ब्लॉक, तृणमूल कांग्रेस । राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणा पत्र में अपनी दलीय विचारधारा एवं नीति को प्रस्तावित करते हैं और सत्तारूढ़ होने पर उनकी नीतियों एवं कार्यक्रमों की झलक देखी जा सकती है। लोक नीति को काफी हद तक विपक्षी दल भी प्रभावित करते हैं। वर्तमान दौर गठबंधन सरकारों का है। जो लोक नीतियों को प्रभावित करने में अपनी निर्णायक भूमिका निभाता है। गठबंधन में किसी दल के महत्व को कम नहीं आंका जा सकता क्योंकि सरकार का गठन उन सभी दलीय घटकों से होता है इसलिए सभी की भूमिका एवं महत्व स्वयंसिद्ध है। इसमें देखा गया है कि छोटे-छोटे राजनीतिक दल अथवा निर्दलीय उम्मीदवार भी मंत्रिमण्डल में स्थान बना लेते हैं। शासन अथवा सत्ता को चलाने के लिए सभी गठबंधन करने वाले दलों के साथ संतुलन बनाये रखना होता है।
राज्य स्तरीय दल एवं क्षेत्रीय दल भी अपनी भूमिका से नीति निर्माण को प्रभावित करते हैं। कई दलों की अपनी स्वयं की कोई विचारधारा नहीं होती और मौका पाते ही गठबंधन सरकार में शामिल होकर मंत्री पद पा जाते हैं जैसे डी.एम. के. तेरहवीं लोक सभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन में सरकार में शामिल था और 14वीं एवं 15वीं लोकसभा में प्रगतिशील गठबन्धन ( यू.पी.ए.) में शामिल होकर मंत्री पद प्राप्त किए हुए हैं। इस प्रकार लोक नीति निर्माण में अपने दलीय हितों को भी थोपने में कामयाब हो जाते हैं।
दबाव समूह एवं हित समूह ( Pressure Group & Interest Group )
भारत में नीति-निर्माण को प्रभावित करने में अनेक व्यक्ति समूह हैं। प्रायः दबाव समूह एवं हित समूह को समानार्थ या एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाता है परन्तु व्यवहारिकता में सामान्यतः दबाव समूह व्यक्तिगत अथवा सीमित हित के बजाए किसी विस्तृत एवं सार्वजनिक अर्थात् लोक कल्याणकारी मुद्दे पर बिना राजनीतिक पद प्राप्ति के सरकार के निर्णयों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण स्वरूप हम अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को ले सकते हैं जिसमें एक मजबूत लोकपाल बिल लाने के लिए संघर्ष हुआ। दूसरा उदाहरण अरुणा राय द्वारा पारदर्शिता के लिए सूचना का अधिकार, महानरेगा में सामाजिक अंकेक्षण ऐसे ही व्यापक एवं सार्वजनिक मुद्दे थे। जबकि हित समूह में ऐसे सदस्य संगठित होते हैं जिनकी विचारधारा एवं लक्ष्य समान होते हैं। हित समूह समान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सरकारी अभिकरणों, संस्थाओं एवं शासन पर अपने हितों से सम्बन्धित नीतियों को लागू करने की बात करते हैं जैसे मिशन 28 जहाँ आरक्षित वर्ग के लोगों के हित में पदोन्नति में आरक्षण के समर्थन में दबाव बना रहा है, वहीं दूसरी ओर मिशन 72 आरक्षण को समाप्त एवं पदोन्नति में आरक्षण के खिलाफ पूरी क्षमता से सरकारी नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है। दूसरा उदाहरण गुर्जर आन्दोलन को लिया जा सकता है जिसमें गुर्जरों ने पहले तो अनुसूचित जनजाति में सम्मिलित होने के लिए दबाव बनाया परन्तु आज वे केवल 5 प्रतिशत आरक्षण के लिए दबाव बना रहे हैं। इसने सरकार की नीतियों को इतना अधिक प्रभावित किया कि आनन-फानन में एस. बी. सी. (Special Backward Class) के रूप में राजस्थान में गुर्जरों को बिना किसी संवैधानिक संशोधन या प्रक्रिया के 1 प्रतिशत आरक्षण प्रदान कर दिया।
थॉमस आर. डाई (Thomas R. Dye) के अनुसार "आधुनिक शहरी संस्थागत समाजों में विभिन्न हित समूहों का बाहुल्य है। इनकी विविधता तथा बहुलता के कारण ऐसी संभावना का जन्म ही नहीं हो पाता कि कोई एक हित समूह समस्त क्षेत्रों में नीति-निर्माण को निर्धारित कर सके। इसके विपरीत गरीब, ग्रामीण तथा कृषि समाजों में कम हित समूह उत्पन्न होते हैं परन्तु अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाओं में इन हित समूहों के पास नीति-निर्माण को प्रभावित करने के अधिक अवसर होते हैं।"
दबाव समूह एक स्वस्थ लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वास्तव में दबाव समूह की सतत् एवं तेजी से विस्तृत होती गतिविधि और राजनीतिक प्रक्रिया में सहभागिता कई हजारों लोगों के बीच राजनीतिक सहभागिता का एक संकेत है।
दबाव समूहों को मोटे तौर पर निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
व्यक्तिगत नागरिक (Individual Citizen)
भारत में लोक नीति निर्माण की एक निश्चित प्रक्रिया है और लोक नीति देश की जनता के कल्याण ) अथवा भले-बुरे से जुड़ा हुआ पहलू है। हमारे देश में संसदीय शासन व्यवस्था को अपनाया गया है जिसमें लोकतंत्र की स्थापना करते हुए शासन-प्रशासन चलाया जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाने वाले देशों में भारत सबसे बड़ा देश भी है और इस दिशा में सक्रिय रूप से कार्यरत भी हैं। लोकतंत्र का तात्पर्य 'जनता का जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन है।' अर्थात् देश का शासन चलाने वाले अथवा नीति निर्माण करने वाले जनप्रतिनिधियों का निर्वाचन अथवा चयन जनता अपने मत (Vote) के माध्यम से ही करती है। जिस राजनीतिक दल की विचारधारा जनता की नीतियों के अनुकूल होती है, जनता उसी का समर्थन करती है और शासन या सत्ता में आने पर उस राजनीतिक दल से जनाकांक्षाओं पर खरा उतरने की अपेक्षा रखती है।
दूसरी बात जो कि स्थानीय स्तर की संस्थाओं में सैद्धान्तिक रूप से देखने को मिलती है वह है अपने वार्ड या ग्राम पंचायत की नीति या विकास का खाका वार्ड सभा एवं ग्राम सभा के माध्यम से लोगों की सहभागिता के आधार पर खींचती है। परन्तु व्यावहारिक स्थिति में इसकी पालना नहीं के बराबर हो पायी है। इसी प्रकार चाहे लोक सभा अथवा विधानसभा का चुनाव हो, मतदान में जनता की भागीदारी कम ही रहती है और देश की सत्ता सम्भालने वाले लोग मतदान करने वालों के भी 30-40 प्रतिशत मतों पर ही शासन के हकदार बन बैठते हैं जो हमें सोचने को मजबूर करता है कि यह कैसी शासन व्यवस्था है जहाँ लगभग आधी आबादी (50 प्रतिशत) तो मतदान ही नहीं करती और जो करती है उनके सामने विकल्प विचारधाराएँ इतनी होती हैं कि उनमें भी बहुमत नहीं बन पाता है। ऐसी स्थिति में गठबंधन की सरकार बन जाती है। कई बार ऐसा भी होता है कि देश या राज्य की किसी नीति पर आम जनता से भी अपनी राय आमंत्रित की जाती है जिसका माध्यम 4 तकनीकी एवं संचार के साथ-साथ समाचार-पत्र भी होते हैं। विभिन्न माध्यमों से प्राप्त राय भी नीति निर्माण को प्रभावित करती है।
यह अत्यन्त आवश्यक है कि आम जनता अधिक से अधिक नीति निर्माण प्रक्रिया में शामिल हो और उसे निर्णयन प्रक्रिया की बेहतर समझ हो । वास्तव में एक जिम्मेदार और प्रभावी सरकार बनाने की बात को जनता को अवश्य समझना चाहिए और सक्रिय रूप से नीति विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए जो कि समाज के समक्ष हैं, यदि वे चाहते हैं तो हमारे लोक अधिकारियों को पाठ्यक्रम निर्धारण में सहायता करनी चाहिए। प्रारम्भ से लेकर निर्णयन प्रक्रिया में जनता को शामिल करने से संभावनाओं में वृद्धि होगी जिससे नीति राजनीतिक रूप से समर्थित, पोषित और कार्यान्वित होगी (Graves, 1995, Nation's Cities Weekly) ।
दरअसल, नागरिक राजनीतिक प्रक्रिया में सहभागी होना चाहते हैं, यदि उन्हें ऐसा लगे कि वे फर्क कर सकते हैं कि उनकी आवाज सुनी जायेगी तथा लोक अधिकारी वास्तविक रूप से सुन रहे हैं। जनता सहभागिता करेगी जब उन्हें विश्वास होगा कि वहाँ कम से कम कुछ करने और परिवर्तन की संभावना होगी। वे चाहते हैं कि लोक अधिकारीगण जवाबदेह बने (Lee Janis) ।
क्या यह जरूरी है कि विभिन्न प्रकार के सौ अलग-अलग तरीकों से हमारे नागरिकों को लगाया जाये, शामिल हो, स्वामित्व और सामूहिक कार्यवाही करने के लिए निर्णयन में प्रतिबद्ध होना चाहिए। राजनीतिज्ञों को चाहिए कि वे सिर्फ दिखावा नहीं करें, उन्हें वास्तव में कुछ शक्तियों को देखना चाहिए अन्यथा वे लोगों से अलग-थलग पड़ जायेंगे (Mathew Taylor 2003 Chifley Lecture as Reported by Michelle Grattan, The Sunday Age, April 6, p. 15) नागरिकों में शासन के लिए एक नई धारणा है जिसके लिए राजनीतिक नेतृत्व के माध्यम से निर्णय लेने के तरीकों, निर्णयन और नीति निर्माण में नागरिकों के सलंग्न (जोड़ने) करने की दिशा में कार्य करना चाहिए (Naidoo, K., 2003, Civil society, Governance and Gloablisation, p. 7)
सक्रिय रूप से भागीदारी नागरिकों की क्षमता के रूप में पहचानी जाती हैं- नीति विकल्पों पर चर्चा करने और स्वतंत्र रूप से नीति निर्माण करने के लिए यह सरकारी एजेण्डा सेटिंग में साझा करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि नीति प्रारूप संयुक्त रूप से बनते हैं, वे अन्तिम निर्णय तक पहुँचने में ध्यान में रखे जाते हैं (Curtain, Richard, 2003, What role for Citizens in Developing and Implementing Public Policy)
नीति निर्माण में सरकार - नागरिक सम्बन्धों की परिभाषा (Definition of Government- Citizen Relations in Policy- making)
सरकार- नागरिक सम्बन्ध नीति निर्माण चक्र के प्रत्येक स्तर पर गुथे हुए और व्यापक स्पेक्ट्रम समाहित किए हुए होते हैं- नीति डिजाइन से क्रियान्वयन करते हुए मूल्यांकन तक। इस जटिल सम्बन्ध को देखते हुए ओ. आई.सी.डी. सर्वेक्षण ने निम्न परिषाभाएँ दी-
• सूचना (Information) एक तरफा सम्बन्ध जिसमें सरकार पैदा करती है और नागरिकों द्वारा उपयोग की गई सूचनाओं का वितरण करती है।
• सक्रिय सहभागिता (Active Participation) - इसमें सरकार के साथ साझा करने के आधार पर सम्बन्ध होते हैं जिसमें नागरिक नीति निर्माण प्रक्रिया में सक्रिय रूप से संलग्न होते हैं। यह नीति विकल्पों के प्रस्ताव और नीति चर्चा को आकार देने में नागरिकों की भूमिका को पहचान देती है फिर भी अन्तिम निर्णय अथवा नीति निर्माण के लिए जिम्मेदारी सरकार की होती है।
नागरिकों को नीति निर्माण में संलग्न करने के लिए निर्देशक सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-
(i) प्रतिबद्धता (Commitment)
(ii) अधिकार (Rights)
(iii) स्पष्टता (Clarity)
(iv) समय ( Time )
(v) वस्तुनिष्ठता (Objectivity)
(vi) संसाधन (Resources)
(vii) समन्वय (Co-ordination)
(viii) जवाबदेयता (Accountability)
(ix) मूल्यांकन (Evaluation)
(x) सक्रिय नागरिकता (Active Citizenship)
जनसम्पर्क माध्यम (Media)
मीडिया आज जनमत को सर्वाधिक प्रभावित कर रहा है और इसमें इलेक्ट्रोनिक मीडिया के साथ-साथ प्रिंट मीडिया भी अहम भूमिका निभा रहा है। मीडिया जनसम्पर्क या जनसंचार का सबसे सरल एवं सुलभ साधन हैं जो न केवल दैनिक घटनाओं एवं स्थिति से अवगत करवाता है अपितु सूचनाओं, आंकड़ों एवं तथ्यों के विश्लेषण से शासन सत्ता, विपक्षी या अन्य राजनीतिक दलों, स्वयंसेवी संस्थाओं, व्यक्तियों, वैज्ञानिकों आदि की सकारात्मक एवं नकारात्मक भूमिकाओं को उजागर करता है जिससे जनता प्रभावित होती है। आज लगभग सभी घरों में टेलीविजन की सुविधा उपलब्ध है और कई चैनल तो 24 घण्टे समाचार चलाते हैं, इसके बावजूद सुबह की चाय एवं नाश्ता समाचार-पत्रों के साथ होता है। देश-विदेश के प्रत्येक कोने की खबर चाहे छोटी हो या बड़ी हो, सभी से अवगत कराता है और इसी के आधार पर जनता के विचारों का प्रवाह होता है। उदाहरण के लिए यदि इलैक्ट्रोनिक मीडिया अन्ना हजारे के आन्दोलन को इतना प्रचारित-प्रसारित नहीं करता तो देश के प्रत्येक हिस्से से लोग इससे नहीं जुड़ पाते। मीडिया में वो क्षमता एवं दक्षता होती है जो लेखनी एवं मस्तिष्क की उपज से लोगों की विचारधारा को बदल देती हैं।
इसी प्रकार चाहे कॉमनवैल्थ गेम्स घोटाला हो, 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला हो या कोयला आवंटन घोटाला हो, सभी को मीडिया ने जनता तक पहुँचा कर उनकी विचारधारा को बदल दिया और साथ ही इन घोटालों से जुड़े व्यक्तियों और राजनीतिक दलों को भी कार्यवाही के नाम पर अपनी नीति में परिवर्तन करना पड़ा जैसे ए. राजा को मंत्री पद से हटाया जाना। कई बार सरकार की नीतियों से हो रहे नुकसान से जनता अनभिज्ञ रहती है और मीडिया ऐसे राज की बातों का खुलासा करता है कि सरकार की जड़ें ही हिल जाती हैं। मीडिया प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नीतियों पर निगरानी का कार्य करता है और नीतियों की रिक्तताओं एवं क्षमताओं को उजागर कर रहा है। अब चाहे नरेगा में घोटालों के खुलासे का मामला हो या सूचना के अधिकार अधिनियम से बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों, लोक सेवकों, संगठनों अथवा व्यक्तियों के काले कारनामों का मामला हो, सभी ने सक्रिय एवं प्रभावी भूमिका का निर्वहन किया है। इतना ही नहीं मीडिया किसी नीति पर बहस एवं चर्चा के लिए कई कार्यक्रम प्रसारित करता है जिसमें राजनीतिज्ञों के साथ-साथ विषय विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, अनुभवी एवं गणमान्य लोगों को शामिल कर वास्तविकता से अवगत कराया जाता है। मीडिया सत्तारूढ़ दल के चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल कार्यों को लागू नहीं करने पर जनता का ध्यान आकृष्ट करता है जिससे जनता सत्तारूढ़ दल की कथनी और करनी के अन्तर को जान सके। लोक नीतियों को प्रभावित करने में संचार माध्यम अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जिसमें तीन की भूमिका मुख्य रूप से देखी जा सकती है-
■ अवगतकारी भूमिका (Comprehended Role) जनसंचार माध्यम देश-विदेश में चल रहे वास्तविक घटनाक्रम, समस्याओं, चुनौतियों, लक्ष्यों, विकास कार्यक्रमों और योजनाओं की जानकारी जन-जन तक पहुँचाने का कार्य करता है। समाज के प्रत्येक वर्ग एवं समूहों को जन समस्याओं, तकनीकी आविष्कार, वैज्ञानिक प्रगति, महत्वपूर्ण चर्चाओं एवं जनप्रतिक्रियाओं से लोगों को अवगत करवाता है, जिससे जनमानस को भविष्य एवं वर्तमान की स्थिति के लिए तैयार किया जा सके।
. दिशा निर्धारण भूमिका (Directive Role) - जैसा कि सर्वविदित है कि लोक नीतियों के निर्माण पर राजनीतिक वर्ग के लोगों का अधिकार है और जिनसे इनको लाभ होता हो. या हुआ हो। इसके हितों का ध्यान ये अवश्य रखते हैं। यह अक्सर देखा जाता है कि लोक नीतियों पर अभिजात्य वर्ग का प्रभाव बहुत अधिक होता है क्योंकि वह वर्ग येन-केन-प्रकारेण सत्तारूढ़ दल या राजनीतिक दलों से कहीं ना कहीं जुड़ा हुआ होता है। परन्तु जब आमजन या वंचित गरीब वर्ग के लोगों के हितों पर कुठाराघात होता है तो मीडिया या जनसंचार माध्यमों द्वारा उस नीति के विरोध में तर्क-वितर्कों से सत्ता एवं आमजन को जागरूक बनाया जाता है और जब सरकार आलोचना का शिकार बनती है तो निश्चित रूप से नीति की दिशा परिवर्तित करनी पड़ती है।
परामर्शदायी भूमिका (Consultational Role) - किसी भी कार्य को करने के एक से अधिक विकल्प हो सकते हैं और जितने अधिक विकल्प होते हैं, उनमें से सर्वश्रेष्ठ को चुनना कठिन कार्य होता है क्योंकि क्रिया-प्रतिक्रिया, गुण-दोष, लाभ-हानि, शुभ-अशुभ आदि सभी के साथ जुड़े हुए होते हैं। परन्तु भारत एक लोककल्याणकारी राज्य है और लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थक है, इसमें सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी सार्वजनिक नीतियों से अधिकतम जनता के कल्याण का ध्यान रखे। इस हेतु कठिन परिस्थितियों, समस्याओं एवं नीति प्रस्तावों पर जनसंचार माध्यम विशेषज्ञों की राय, सम्पादकीय कॉलम, लेख, चर्चा, सर्वेक्षण करके एक सलाहकारी भूमिका का निर्वहन करते हैं।
नीति निर्माण में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका (Role of Non-Government Organization in Policy Formulation)
भारत में गैर-सरकारी संगठनों को अनेक नामों से जाना जाता रहा है जिनमें हैं- सिविक संस्थाएँ, सामाजिक आन्दोलन, स्वैच्छिक संगठन, गैर सरकारी संस्थाएँ, लाभ निरपेक्ष संगठन, स्वतंत्र समर्थन समूह इत्यादि । किसी भी देश में केवल सरकारी प्रयासों से विकास संभव नहीं है और न ही सभी जनसमस्याओं का निराकरण सम्भव है। किसी भी कार्यक्रम, योजना अथवा नीति के निर्माण से लेकर क्रियान्वयन, मूल्यांकन एवं उसके अंकेक्षण तक जनसहभागिता महत्वपूर्ण होती है। सरकारी कार्यों, कार्यप्रणाली, नौकरशाही एवं जनप्रतिनिधियों की गिरती छवि ने आमजन का विश्वास खोया है। जब एक जैसे कार्य सरकार एवं स्वैच्छिक संगठनों द्वारा सम्पन्न कराये जाते हैं तो उनमें कई पक्षों में भारी अन्तर देखने को मिलता है जिनमें हैं- औपचारिकताएँ, अनावश्यक देरी, अनुमानित लागत एवं व्यय, जनसहभागिता, गुणवत्ता, अनुकूलता इत्यादि । भारत की लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था में लोक कल्याण की दिशा में अनेक गैर-सरकारी संस्थाएँ अहम् भूमिका निभा रही हैं। सरकारी तंत्र में लोक सेवकों का मनमाना एवं निरंकुश व्यवहार भी अनेक बार गैर-सरकारी संस्थाएँ स्थापित करने को मजबूर कर देता है। गैर-सरकारी संस्थाएँ जन चेतना एवं जागृति पैदा करने, जनता को अपने अधिकारों की जानकारी देने एवं सरकारी कार्ययोजनाओं में छिपे हुए रहस्यों को सामने लाने में भी महती भूमिका निभाती हैं।
स्वैच्छिक संस्थाएँ किसी के द्वारा थोपी हुई नहीं होती अपितु स्वेच्छा से कल्याणकारी कार्यों के प्रति प्रोत्साहित होकर बनाई जाती हैं। इन संस्थाओं का अपना कार्यक्षेत्र, कार्य की प्रकृति, संगठनात्मक संरचना, नियम, उपनियम, कार्य, शक्तियाँ आदि निहित होती हैं या यों कहें कि इन संस्थाओं का अपना एक संविधान होता है जिसके अनुसार ये अपने क्षेत्र विशेष में रहकर कार्य करती हैं। चूंकि ये स्वैच्छिक संगठन अपने कार्य क्षेत्र में विशेषज्ञता रखते हैं या सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, तकनीकी दक्षता जो उस कार्य के लिए आवश्यक होती है, से भली प्रकार परिचित होते हैं। देश में जब कोई नीति उन संस्थाओं से सम्बन्धित होती है तो उससे सम्बन्धित प्रत्येक मुद्दे या पहलू पर बेहतर राय दे सकते हैं।
देश में किस प्रकार की नीति की आवश्यकता है, उसका कार्यक्षेत्र कैसा हो, उसका निर्माण, क्रियान्वयन, मूल्यांकन कैसे हो आदि के बारे में महत्वपूर्ण तर्काधार प्रस्तुत कर सकते हैं-
1. स्वयंसेवी संस्थान शासन सत्ता का ध्यान ऐसी समस्याओं एवं मुद्दों की ओर आकृष्ट करते हैं जिन पर नीति बनाये जाने की आवश्यकता होती है। पारदर्शी शासन, सूचनाओं को जनता तक पहुँचाने के लिए एवं अकुशल श्रमिकों को रोजगार की दिशा में सूचना का अधिकार, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम, मजदूर किसान शक्ति संगठन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने इनका आधार प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है इसके अलावा पर्यावरण संरक्षण में मेधा पाटेकर, जल संरक्षण की दिशा में तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह ने अलख जगाकर नीति हेतु आधार प्रदान किया।
2. ये संगठन न केवल समस्याएँ बताते हैं अपितु नीति-निर्माण के लिए तथ्य, आंकड़ें, सूचनाएँ एवं अनुसंधानीय निर्गतों से नीति का आधार प्रदान करने में सहायता करते हैं। इतना ही नहीं बल्कि नीति के लिए विभिन्न वैकल्पिक मार्गों को सुझाते हुए उनके गुण-दोष, लाभ-हानि, वर्तमान एवं भविष्य की संभावनाओं को बताते हुए श्रेष्ठ विकल्प की ओर संकेत करते हैं।
3. गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका नीति क्रियान्वयन में भी महत्वपूर्ण होती है क्योंकि ये संगठन एक तो स्वेच्छा से सहभागी होते हैं, दूसरे उसके क्षेत्र एवं प्रकृति के साथ वहाँ की पारिस्थितिकी को भली प्रकार समझते हैं। तीसरे जनसहयोग एवं सहभागिता से नीति को शीघ्र लागू किया जा सकता है और उपलब्ध संसाधानों का सही दिशा में उपयोग किया जा सकता है, चौथे वे पूर्वाग्रह रहित एवं वस्तुनिष्ठ रहकर कार्य करते हैं जिसमें लोक कल्याण की भावना का पूरा ध्यान रखा जाता है। पाँचवें इन संगठनों को धरातल पर नीतियों में आ रही बाधाओं एवं समस्याओं का ज्ञान एवं अनुभव होने से वे पहले से उसके लिए तैयार रहते हैं और उनका समाधान ढूंढ लेते हैं।
4. नीति निर्माण, क्रियान्वयन के पश्चात् नीति का मूल्यांकन करने में भी स्वैच्छिक संगठनों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि नीति का उद्देश्य केवल उसको बनाने एव क्रियान्वयन की औपचारिकताओं तक ही नहीं होता बल्कि नीति को बनाने एवं उसको लागू करने से हो रहे प्रभावों को जानना भी आवश्यक होता है जिससे निर्मित की गई नीति की व्याख्या और विश्लेषण किया जा सके। नीति निर्माण एवं क्रियान्वयन के परिणामों एवं प्रभावों का गैर-सरकारी संगठन निरपेक्षता से आंकलन करने में सहायता करते हैं।
भारत में गैर-सरकारी संगठनों को कानूनी मान्यता प्राप्त होती है, क्योंकि वे अपने आपको समिति, पंजीकृति अधिनियम, 1860 के अधीन पंजीकृत करते हैं। इन संगठनों को उनके कार्यों के आधार पर मुख्य रूप से चार प्रकारों में बांटा जा सकता है-
1. सेवान्मुखी संगठन (Service Oriented Organizations) - इस प्रकार के संगठनों का मुख्य उद्देश्य नागरिकों या लोगों की सेवा करना होता है। इसमें चिकित्सा सेवा, शिक्षा, परिवार नियोजन आदि सेवाएँ सम्मिलित की जाती हैं।
2. दान उन्मुखी संगठन (Charity Oriented Organizations)- इसमें लोगों को बुनियादी आवश्यकताएँ उपलब्ध करवाने का ध्येय होता है जिनमें रोटी, कपड़ा, मकान, वस्त्र, आश्रम आदि हो सकते हैं।
3. सशक्तिकरण उन्मुख संगठन ( Empowerment Oriented Organizations) - इस प्रकार के संगठनों का उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि पिछड़े, कमजोर, वंचित लोगों को शिक्षिण-प्रशिक्षण सुविधाएँ प्रदान कर सशक्त बनाना होता है।
4. सहभागिता उन्मुखी संगठन (Participation Oriented Organizations) - इस प्रकार के संगठनों का मुख्य उद्देश्य कल्याणकारी कार्यों को जन सहयोग, सामुदायिक सहयोग के माध्यम से क्रियान्वित करना होता है।
वर्ल्ड बैंक (World Bank) के अनुसार गैर-सरकारी संगठन- "वे निजी संगठन हैं जो जनता सुख-दुख में काम करते हैं, गरीबों के हितों की रक्षा करते हैं, पर्यावरण की रक्षा में सम्मिलित के रहते हैं या देश के विकास के कार्यों में कार्यरत रहते हैं, गैर-सरकारी संगठन कहलाते हैं।" अब यदि सभी स्वैच्छिक संगठन इस परिभाषा को ध्यान में रखकर कार्य करें तो देश का विकास स्वतः हो सकता है। आज देश में स्वैच्छिक संगठनों की भरमार है परन्तु अधिकांश संगठन वाह्य आवरण एवं दिखावा करके विदेशों एवं सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त कर प्रतिवेदनों में कागजी पुल बनाकर धन का दुरुपयोग कर रहे हैं (मीना, जनक सिंह, 2010, मूल प्रश्न, पृ. 23-25)। इसी प्रकार , दिसम्बर, 2009 में कपार्ट (CAPART) ने 839 गैर-सरकारी संगठनों की सूची जारी की थी जिन्हें आर्थिक सहयोग के दुरुपयोग का दोषी पाया गया था और उन्हें 'काली सूची' (Blacklisted) में डाल दिया गया था ( फाटक, अरविन्द, 2010, मूल प्रश्न, पृ. 13-16) ।





