भारत में विधिक नियम और आपराधिक न्याय प्रणाली
'जब विधि का नियम लुप्त हो जाता है, तो हम पुरुषों की सनक पर शासन करते हैं" - टिफनी मैडिसन
प्रस्तावना
आज भारत में विधि का शासन अर्थात 'रूल ऑफ लॉ' (Rule of Law) सामाजिक व्यवस्था का एक शक्तिशाली मानदंड है। भारत वर्ष में विधि का शासन संविधान द्वारा प्रदत्त व्यवस्था से किया जाता है। भारतीय संविधान विधि के शासन के लिए सभी आवश्यक मापदंडों पर खरा उतरता है। लेकिन भारतीय राजनीति व सामाजिक व्यवस्था में यह भी देखने में आता है कि समय-समय पर सरकारें व शासन विधि के शासन को पूर्ण रूप से लागू करने में विफल रही हैं। 300 वर्षों के शासन के उपरांत भी भारत वर्ष में शासन लोगों का पूर्ण विश्वास जीतने में विफल रहा है। वर्तमान की स्थिति यह है कि 70% से अधिक विवादों का निपटारा न्यायालयों के बाहर किया जाता है। आज लोगों में कानूनी प्रक्रिया को लेकर असंतोष देखने को मिलता है क्योंकि उन्हें सही समय पर न्याय नहीं मिलता, जहां मिलता है, वहां बहुत देर हो जाती है, या खण्डित न्याय मिलता है। न्यायपालिका, राजनीति और देश के नौकरशाहों में भ्रष्टाचार की समस्या ने 'विधि के शासन' को स्थापित होने में बाnधाएं पैदा की हैं। पक्षपात (Discrimination), जातिवाद, वंशवाद सफेदपोश अपराधों की समस्या, घोटाले, राजनीति में धन का प्रभाव, पूँजीवादीयों द्वारा देश के संसाधनों को लूटने वाले अराजक तत्वों आदि ने विधायिका व न्याय प्रणाली को प्रभावित किया है।
विधि के शासन (Rule of Law) का एक लंबा प्रामाणिक इतिहास रहा है, जो इसे यूरोप व अमेरिका के उदारवादी राजनीतिक सिद्धांत के रूप में विशेषाधिकार देता है। सरल शब्दों में विधि का नियम किसी अन्य निर्वाचित प्रतिनिधि के सार्वभौमिकता के अंतर्गत विधि की सर्वोच्चता को परिभाषित करता है। 'ला प्रिंसिपे डे लीलाइट' अर्थात शासन विधि द्वारा निर्देशित होता है किसी व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं- इस वाक्यांश की व्याख्या अलग-अलग देशों में अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग तरीकों से की है।
अरस्तू तर्क के नियम के सिद्धांत व प्राकृतिक न्याय से संबंधित कानून के संदर्भ में अपना मत प्रस्तुत करते हैं।
वहीं सबसे प्रसिद्ध और स्वीकृत सिद्धांतों में से एक प्रोफेसर ए.वी. डाइसी ने अपनी पुस्तक (Introduction to the Study of the Law of the Constitution-1885) में विधि के शासन की आधुनिक अवधारणा की विस्तृत व्याख्या की है। उन्होंने अपनी पुस्तक 'द लॉ ऑफ द कॉस्टीटूशन' के माध्यम से एक सिद्धांत दिया है कि सरकार को विधि के शासन पर आधारित होना चाहिए ।
1. विधि की सर्वोच्चता : विधि की सर्वोच्चता का अर्थ यह है कि कानून द्वारा स्थापित न्याय सर्वोच्च है। कानून को लागू करने की प्रक्रिया समान रूप से सभी पर लागू होती है। कानून की दृष्टि से समाज का प्रत्येक व्यक्ति बराबर है। और सभी को कानून का पालन करना है। कानूनी व्यवस्था को चलाने के लिए सभी घटकों का दायित्व व कर्तव्य बराबर हैं। विधि की सर्वोच्चता हम इस रूप में भी कह सकते हैं जहां व्यक्ति का विवेक कानून द्वारा स्थापित विधि के अनुरूप कार्य करता है।
2. विधि के समक्ष समानता : विधि के समक्ष समानता से तात्पर्य है कि विधि को न्यायपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से प्रशासित किया जाना चाहिए । अर्थात कोई भी पद विधि और प्रक्रिया के अधीन होना चाहिए जैसा कि न्याय की अदालत में होता है। डायसी ने कहा कि प्रधानमंत्री से लेकर कांस्टेबल या करों का संग्रह करने वाले प्रत्येक अधिकारी विधि के अधीन हैं। किसी भी अन्य नागरिक की तरह कानूनी औचित्य के बिना किए गए हर कार्य के लिए समान जिम्मेदार होना चाहिए।
3. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका : डायसी का मानना है कि सिर्फ उपरोक्त दो सिद्धांतों को बनाना और लागू करना पर्याप्त नहीं होगा। विधि को बनाए रखने और लागू करवाने का अधिकार स्वतंत्र एवं निष्पक्ष अदालतों का होगा। स्वतंत्र न्यायपालिका जो विधि के नियम कार्यान्वयन के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
हालांकि, विधि (कानून) की उत्पत्ति की अवधि के लिए कोई आम सहमति नहीं है, लेकिन यह माना जाता है कि विधि के दो मूल सिद्धांत प्रारंभिक काल से अस्तित्व में रहे हैं। सत्ता में रहने वालों को विधि का पालन करना चाहिए, और सभी लोगों को कानूनों को कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। विधि का दृष्टिकोण महान धार्मिक और राजनितिक विचारक सुकरात द्वारा अपनाया गया था, जब एथेंस की ग्रैंड जूरी द्वारा अपने शिक्षण के साथ युवाओं को भ्रष्ट करने के लिए दोषी ठहराया गया, उन्होंने विचार व विधि की सर्वोच्चता के लिए अपनी निष्ठा का प्रदर्शन करने के लिए, मौत के फैसले को चुना। बाद में सुकरात के शिष्य प्लेटो, जिन्होंने विधि के शासन की व्याख्या की। प्लेटो के अनुसार, अगर राज्य का शासन विधि अनुरूप नहीं होगा तो राज्य का पतन हो जाएगा। और ऐसी स्थिति में सरकार और राज्य में विरोध की स्थिति पैदा हो जाएगी। सरकार और राज्य को दास के अनुरूप समझेगी और स्वयं को मालिक। ऐसी स्थिति में शक्तिशाली मनुष्य राज्य में आनंद लेंगे और सामान्य पीड़ित रहेंगे ।
भारत में अंग्रेजों के आने से बहुत पहले ही विधि का शासन था। लेकिन कालांतर में विदेशी आक्रमणों के कारण धीरे-धीरे उसमें विकार उत्पन्न होते चले गये। 19वीं और 20वीं शताब्दी में विधि शासन की अवधारणा को बहुत प्रतिष्ठा मिली, जिसके परिणामस्वरूप, इसे न केवल इंग्लैंड और उसके उपनिवेश देशों में स्वीकार किया गया, बल्कि यह एक अंतर्राष्ट्रीय आदर्श बना।
भारत में स्वतंत्रता के बाद विधि के शासन को कानूनी प्रणाली की आधारशिला माना जाता है। 'विधि शासन' किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का मूल नियम है। हमारी संवैधानिक योजना विधि के शासन की अवधारणा पर आधारित है जिसे हमारे द्वारा अपनाया गया और स्वयं को समर्पित किया गया है। प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से विधि की सर्वोच्चता को स्वीकार करता है। कोई भी व्यक्ति, कितना भी उच्च हो, लेकिन कोई भी विधि से ऊपर नहीं है, भले ही वह कितना शक्तिशाली, प्रभावशाली और कितना ही समृद्ध हो । विधि के शासन की स्थापना को प्राप्त करने के लिए, संविधान ने देश में न्यायपालिका को विशेष कार्य सौंपा है। यह केवल अदालतों के माध्यम से है कि विधि का शासन अपनी सामग्री को प्रकट करता है और अपनी अवधारणा स्थापित करता है।
विधि से तात्पर्य (Meaning)
1. यह नियमों का एक समूह है।
2. यह मानव आचरण को नियंत्रित करता है।
3. यह राज्य द्वारा बनाया और बनाए रखा जाता है।
4. इसमें निश्चित मात्रा में स्थिरता, लचीलापन और एकरूपता होती है।
5. यह नियत प्राधिकरण द्वारा समर्थित है।
6. इसका उल्लंघन दण्डनीय है।
7. यह लोगों की इच्छा की अभिव्यक्ति है और आमतौर पर इसे निश्चितता देने के लिए माना जाता है।
8. यह 'संप्रभुता' की अवधारणा से संबंधित है जो राज्य का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।
9. विधि कानूनी अधिकार बनाता है।
10. विधि अनिवार्य रूप से क्षेत्रीय प्रकृति का है और यह राज्य के क्षेत्र में लागू होता है।
विधि की व्याख्या का विस्तृत स्वरूप (Detailed Form of Interpretation of Law)
1. विधि बाहरी मानवीय कार्यों से संबंधित है। कई बार, आंतरिक मानवीय क्रियाएं भी विधि का विषय हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि A, B की कार्रवाई के कारण हुई दुर्घटना में मारा जाता है और यदि यह साबित होता है कि B ने जानबूझकर A की हत्या की है, तो उस पर दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 302 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। लेकिन अगर यह साबित हो जाता है कि B का A को मारने का कोई इरादा नहीं था, तो उसके लिए अलग प्रावधान है। इस प्रकार, बाह्य और साथ ही साथ आंतरिक दोनों क्रियाओं का संज्ञान विधि द्वारा लिया जाता है।
2. विधि संप्रभु द्वारा लगाए और लागू किए गए आचरण का नियम है। सरकार आवश्यक अधिनियमों को पारित करके नागरिक के आचरण को नियंत्रित करती है! यह देश के नागरिक द्वारा पालन किए जाने वाले आचरण की एक सामान्य प्रक्रिया है। सरकार द्वारा लागू किए गए ऐसे नियम या अधिनियम को 'विधि' कहा जाता है।
3. देश में लोगों के शांतिपूर्ण और समृद्ध जीने के लिए आचरण के नियम बहुत आवश्यक हैं। एक अर्थ में, वे सभी लोगों को अधिकतम स्वतंत्रता प्राप्त करने में मदद करते हैं।
4. विधि का नियम सर्वोच्च है और सभी के लिए समान लागू होता है। यह गरीबों व अमीरों के लिए, शासकों के लिए और देश के अन्य विषयों के लिए भी ऐसा ही है। इस प्रकार, विधि के अंतर्गत संप्रभु द्वारा लागू सभी नियम या अधिनियम शामिल होते हैं जो नागरिकों, सरकार या राज्य के मध्य संबंधों को नियंत्रित करते हैं। अर्थात यह सिद्धांतों का ऐसा निकाय है जो समय-समय पर विधायिका द्वारा निर्धारित मानव व्यवहार के सम्बन्धो को केंद्रित करता है। इन सभी सिद्धांतों को देश की न्यायपालिका द्वारा व्याख्या और लागू किया जाता है।
विधि का शासन अर्थ - (Meaning 'Rule of Law' )
'विधि का शासन' शब्द एक ऐसा वाक्यांश है जिसका उपयोग आमतौर पर विधि के अध्ययन में किया जाता है। यह फ्रेंच वाक्यांश 'ला प्रिंसिप डे लीनाइट' (La principe de linnite) से लिया गया है जिसका अर्थ है 'कानून का प्रमुख' (Head of Law) |
यह विधि के सिद्धांतों के आधार पर सरकार को केंद्रित करता है और व्यक्ति को नहीं। दूसरे शब्दों में, 'ला प्रिंसिपे डे लीनाइट' की अवधारणा मनमानी शक्तियों के विरोध में है।
'विधि का शासन' का अर्थ हैं, मनमाने तौर पर शक्ति के प्रभाव के विपरीत नियमित विधि की पूर्ण सर्वोच्चता या प्रबलता, सरकार की ओर से मनमानी इत्यादि ।
विधि द्वारा संचालित शासन की अवधारणा एक बहुत ही गतिशील अवधारणा है, जो लोकतंत्र को सक्षम करने के लिए आवश्यक है।
सरल शब्दों में, विधि शासन शक्ति को अच्छी तरह से परिभाषित और स्थापित करने व कानूनों को अधीन करके सत्ता की मनमानी पर प्रतिबंध लगाने का कार्य करता है। विधि को राष्ट्र पर शासन करना चाहिए न कि व्यक्तियों द्वारा। इस प्रकार, विधि का शासन विधि की सर्वोच्चता के सिद्धांत का प्रतीक है।
आधुनिक 'विधि का शासन (रूल ऑफ लॉ)' के प्रोफेसर, ए.वी. डाइसी का मानना है कि जो अलिखित ब्रिटिश संविधान में निहित है। पहला और प्राथमिक सिद्धांत 'संसद की संप्रभुता या सर्वोच्चता' व दूसरा सिद्धांत, 'विधि का शासन था। इसलिए डाइसी ने विधि के नियम को एक व्यक्ति के रूप में राज्य की सैद्धांतिक असीमित शक्ति पर एक नियंत्रण (हालांकि अंतिम नियंत्रण नहीं) के रूप में देखा। उनके लिए विधि के सिद्धांत का नियम मौजूदा आम विधि से अधिक वर्षों से था।
डाइसी के अनुसार विधि के शासन की तीन मुख्य विशेषताएं हैं:
पहला, बिना कानूनी प्रक्रिया के पालन किए किसी व्यक्ति को दंडित नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन विधि के उल्लंघन के लिए, आवश्यक हो तो किया जाना चाहिए, ताकि लोगों के कार्यों और लेनदेन का मार्ग सुनिश्चित किया जा सके। डायसी का मानना है कि विवेकहीन शक्ति से मनमानी होगी।
दूसरे, यह कि कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं होना चाहिए और सभी वर्गों को समान रूप से विधि के समक्ष अधीन होना चाहिए।
तीसरा, यह है कि विधि का शासन किसी लिखित संविधान से नहीं, बल्कि 'सामान्य विधि' से होना चाहिए, जिसे वह किसी भी देश के संवैधानिक विधि की नींव के रूप में संरक्षण प्राप्त कर सके।
हालाँकि तीसरी विशेषता भारत में काफी हद तक सफल नहीं हो पायी है। इस संबंध में न केवल भारत ने अपितु कई अन्य देशों ने भी अपनी स्वदेशी कानूनी प्रणाली को आधार न मानकर विधि के निम्नलिखित तीनों सिद्धांतों को अपनाया है-
(1) विधि की सर्वोच्चता
(2) विधि से पहले समानता और विधि की समान सुरक्षा
(3) कानूनी भावना की स्वतंत्रता व अदालतों द्वारा निर्धारित व्यक्ति के अधिकारों को विधि का शासन माना है।
डाइसी ने विधि के शासन के तीन सिद्धांत का उल्लेख किया है।
1. विधि की सर्वोच्चता (Supremacy of law)
2. विधि के समक्ष समानता (Equality Before the Law)
3. कानूनी प्रक्रिया की सर्वोच्चता (Predominance of Legal Spirit)
डाइसी ने फ्रांस में, अनुभव किया कि सरकारी अधिकारियों ने व्यापक विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग किया था और यदि किसी सरकारी अधिकारी और निजी व्यक्ति के बीच कोई विवाद था, तो यह एक साधारण अदालत द्वारा नहीं बल्कि एक विशेष प्रशासनिक अदालत द्वारा संचालित व नियन्त्रित किया गया। यह व्यवस्था सामान्य विधि नहीं था बल्कि प्रशासनिक न्यायालय द्वारा विकसित एक विशेष विधि थी।
इससे डाइसी ने निष्कर्ष निकाला कि इस प्रणाली ने नियम के शासन की अवधारणा की उपेक्षा की। उन्होंने महसूस किया कि यह विधि के समक्ष समानता के सिद्धांत के खिलाफ था। उन्होंने यह भी कहा कि सभी अंग्रेज विधि के नियम से बंधे हैं और उन्हें नियमित करने के लिए कोई बाहरी तंत्र की आवश्यकता नहीं है। इसलिए, उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इंग्लैंड में कोई प्रशासनिक विधि नहीं था ।
न्याय की व्यवस्था के नियम, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, शीघ्र न्याय प्रदान करने में विफलता, न्याय प्रणाली का लोगों द्वारा विश्वास जीतने में विफलता, सामाजिक असमानता विधि के शासन के सामने बहुत बड़ी समस्या है। धन का असामान्य वितरण, आर्थिक विकास के नाम पर पर्यावरण क्षरण की समस्या आदि विधि के नियम की 'व्यापक' धारणा के दायरे में आते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के भूतवपूर्व महासचिव कोफी अन्नान द्वारा विधि के शासन की एक व्यापक परिभाषा पेश की गई थी। उन्होंने 2004 की रिपोर्ट में कहा की 'विधि का शासन' शासन के एक सिद्धांत को संदर्भित करता है। जिसमें सभी व्यक्ति, संस्थाएं, सार्वजनिक और निजी, जिनमें राज्य भी शामिल हैं, सार्वजनिक रूप से स्थापित कानूनों के लिए उत्तरदायी हैं, समान रूप लागू स्वतंत्र रूप से स्थगित और जो अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानदंडों और मानकों के अनुरूप हैं वही विधि का शासन है।
इसके साथ-साथ विधि की सर्वोच्चता के सिद्धांतों, विधि के समक्ष समानता, विधि के प्रति जवाबदेही, विधि के आवेदन में निष्पक्षता, शक्तियों के पृथक्करण, निर्णय लेने में भागीदारी, कानूनी निश्चितता, परिहार को सुनिश्चित करने के उपायों की आवश्यकता है । मनमानी और प्रक्रियात्मक से लागू कानून न्याय विरुद्ध है।
स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका, विधि के शासन का आवश्यक घटक है, संक्षेप में हमें ब्रिटिश शासन के दौरान न्यायिक निष्पक्षता का विश्लेषण भी किया जाना आवश्यक है। मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, जिन्होंने 1922 में कहा कि: ‘जहाँ भी सत्ताधारियों ने सत्य और न्याय के खिलाफ हथियार उठाए, कोर्ट रूम सबसे सुविधाजनक और प्रशंसनीय हथियार थे।' अधिकांश ब्रिटिश न्यायालयों ने हमेशा पक्षपात की नीति को अपनाया गया, भारतीय जनता और यूरोपीय जनता के बीच भेदभाव किया, पुलिस और अधिकारियों द्वारा बर्बरतापूर्ण व्यवहार को अपनाया गया। इस तरह ब्रिटिश शासन में न्यायालयों ने (ब्रिटिश) भारत में विधि की स्थापना के लिए योगदान तो दिया पर अंग्रेजों के शासन में उन्होंने भारतीयों व ब्रिटिश नागरिकों में भेद किया जो विधि द्वारा न्याय की अवधारणा के विपरीत था ।
वास्तव में भारत में विधि शासन की स्थापना भारत के आर्थिक शोषण को सुविधाजनक बनाने के लिए की गई थी। रॉबर्ट क्लाइव ने 1757 में बंगाल के नवाब की हार एक फारसी गद्दार मीर जाफर के साथ एक साजिश का परिणाम थी। एक लड़ाई में नवाब के मारे जाने के साथ, क्लाइव ने अपनी जगह पर मीर जाफर को स्थापित किया और £30,000 राशि प्रति वर्ष जुर्माने के तौर से वसूल किया। हालांकि उन्होंने पहली बार पूरी राशि एकत्र नहीं की ।
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में कहा गया है: 'समकालीन मूल्यों के संदर्भ में ये अनुदान ग्रेट ब्रिटेन के तत्कालीन वार्षिक राजस्व के लगभग सत्तरहवें हिस्से के बराबर थे। '
चार्ल्स फोर्ब्स, जो भारत में 22 साल तक रहे और संसद सदस्य बनने के लिए इंग्लैंड लौट गए, ने 1836 में हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा कि, भारत के लोगों को दिन-प्रतिदिन और साल-दर-साल लूटने की लम्बी योजना की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत से कुल वार्षिक राशि पांच मिलियन स्टर्लिंग से थोड़ी कम हो सकती है। इसमें EIC के मालिकों से लाभांश के £630,000 शामिल थे। ब्रिटिश संसद द्वारा लूट के लाइसेंस को कानूनी रूप से, भारत के बाकी हिस्सों में तेजी से विस्तारित किया गया था, और 1947 तक जारी रखा गया।
विधि का शासन व भारतीय सविंधान (Rule of Law and Indian Constitution)
स्वतंत्रता के बाद भारत विधि के शासन की रूपरेखा संविधान के माध्यम से प्रस्तुत की गई है। भारत के संविधान के भाग- III में मौलिक अधिकारों का समावेश है, जो नागरिकों को मूल अधिकार के संरक्षण का अधिकार देते हैं।
हमारे संविधान में ब्रिटिश विधि नियम को अपनाया है। मनमाना शक्ति का अभाव विधि के नियम की पहली अनिवार्यता है, जिस पर हमारी पूरी संवैधानिक प्रणाली आधारित है। भारत के संविधान के अंतर्गत, विधि का नियम व्याप्त है। प्रशासन के पूरे क्षेत्र और राज्य के प्रत्येक अंग को नियम विधि द्वारा विनियमित किया जाता है।
भारत के संरक्षण में विधि के कानून की भूमिका (Role of Law in the Protection of India)
भारत में, विधि के नियम की अवधारणा को उपनिषदों में खोजा जा सकता है। आधुनिक समय के साथ-साथ भारतीय संविधान की योजना विधि के शासन की अवधारणा पर आधारित है।
संविधान के निर्माता अच्छी तरह से डायसी द्वारा प्रस्तावित और ब्रिटिश भारत के लिए अपने आवेदन में संशोधित विधि के नियमों से परिचित थे। इसलिए, उन चीजों की फिटनेस में, जो संविधान के संस्थापक निर्माता ने विधि के शासन की अवधारणा को उचित मान्यता दी है।
विधि के नियम को भारतीय संविधान में बहुत ही सफलतापूर्वक शामिल किया गया है। संविधान के आदर्श, न्याय, स्वतंत्रता और समानता प्रस्तावना में निहित है।
भारत के सभी कानूनों का स्रोत भारत का संविधान है। अन्य कानूनों को इसके अनुरूप होना आवश्यक है। कोई भी कानून जो संविधान के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करता है- विशेष रूप से मौलिक अधिकारों को, तो वह विधि विरुद्ध हैं।
भारतीय संविधान भी विधि के समक्ष समानता के सिद्धांत को प्रतिवादित करता है। डायसी द्वारा प्रतिपादित विधि के कानून को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के द्वारा विधि सम्मत मान्यता प्राप्त है। किसी भी व्यक्ति को किसी भी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है जब तक की संबंधित कानून का प्रारूप संविधान सम्मत है। अनुच्छेद 14, 19 और 21 इतने मूल हैं कि उन्हें भारतीय संविधान का स्वर्ण त्रिकोण लेख भी कहा जाता है।
भारतीय संविधान अनुच्छेद 32 और 226 के आधार पर मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए विवादों और शिकायतों के निपटारे के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका भी सुनिश्चित करता है। इसके अंतर्गत कई पहलू देखे जा सकते है जैसे कि नागरिकों के विवादों का निर्णय न्यायाधीशों द्वारा किया जाएगा जो स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं; और सरकार के कृत्यों की वैधता के विवादों का निर्णय भी न्यायाधीशों द्वारा किया जाएगा जो कार्यपालिका से स्वतंत्र हैं।
विधि का शासन - भारतीय संविधान की मूल संरचना का हिस्सा (Rule of Law & Part of the Basic Structure of the Indian Constitution)
संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 ने भारत में विधि शासन की स्थिति को झटका दिया। शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ में विचार के लिए प्रश्न आया, क्या अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों में संशोधन किया जा सकता है ? सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद को अनुच्छेद 13 के तहत अनुच्छेद 368 के द्वारा संविधान के भाग III में संशोधन करने की शक्ति है। मौलिक अधिकारों में संवैधानिक संशोधन मान्य होगा।
यह प्रश्न फिर से सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य में विचार के लिए आया, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने शंकरी प्रसाद मामले में बहुमत के फैसले को मंजूरी दे दी और यह माना कि संविधान में संशोधन का मतलब संविधान के सभी प्रावधानों में संशोधन है।
हालांकि माननीय मुख्य न्यायमूर्ति गजेन्द्र गाड़कर ने कहा कि संविधान के निर्माताओं ने मौलिक अधिकारों को संशोधित करने की सरकार की शक्ति के दायरे से बाहर करने का इरादा किया है, हालाँकि, इन दोनों मामलों को शीर्ष अदालत ने गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य में निरस्त कर दिया और यह सुनिश्चित किया था कि संसद के पास संविधान के भाग III में संशोधन करने की शक्ति नहीं है, जिससे मौलिक अधिकारों को छीन लिया जाए या इस तरह समाप्त कर दिया जाए। न्यायपालिका द्वारा विधि के नियम को खण्डित करने से रोका। गया।
हालाँकि, विधि का नियम संविधान ( चौबीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 के साथ खत्म कर दिया गया था। इस संशोधन के माध्यम से संसद ने अनुच्छेद 13 में एक नया खंड (4) सम्मिलित किया, जिसमें यह प्रावधान था कि इस अनुच्छेद के कोई प्रावधान अनुच्छेद 368 के तहत किए गए बदलाव, संशोधनों पर लागू नहीं होंगे।
इसे केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में चुनौती दी गई थी, जिसे मौलिक अधिकार का केस कहा जाता है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से गोलकनाथ के मामले में दिए गए फैसले को पलट दिया और माना कि संसद के पास संविधान में संशोधन करने की व्यापक शक्तियां हैं और यह सभी अनुच्छेदों तक फैली हुई है, लेकिन संशोधित शक्ति असीमित नहीं है। और इसमें संविधान के मूलभूत ढांचे को नष्ट करने या निरस्त करने की शक्ति शामिल नहीं है साथ ही संविधान रूपरेखा के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन की शक्ति पर सीमाएँ निहित हैं। इन सीमाओं के भीतर संसद संविधान के किसी भी अनुच्छेद में संशोधन कर सकती है। जिसमें अनुच्छेद मौलिक अधिकारों को स्पर्श कर सकता है। इस है। इस प्रकार, का नियम प्रबल हुआ। विधि
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य में, सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि 'संविधान की सर्वोच्चता और विधि की मनमानी के संदर्भ में विधि के नियम को लागू करता है।' 13 जजों की बेंच ने यह भी निर्धारित किया कि विधि का नियम 'संविधान की मूल संरचना का एक पहलू है, जो संसद की पूर्ण शक्तियों की पहुंच से परे है'। केशवानंद मामले के बाद से, विधि के शासन का बहुत विस्तार किया गया है और विभिन्न केसों में अलग-अलग तरीके से लागू किया गया है।
इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 329-ए (संविधान - तीसवां संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा डाला गया खंड (4) को किसी भी तरह से प्रधान मंत्री के चुनाव विवाद को रद्द करने के लिए अमान्य कर दिया। न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में न्यायालय ने कहा कि इससे विधि के शासन की अवधारणा का उल्लंघन हुआ हैं जिसे संसद द्वारा भी निरस्त या नष्ट नहीं किया जा सकता।
एस.के. शुक्ला बनाम जबलपुर को हैबियस कॉर्पस केस के रूप में जाना जाता है, कई विद्वानों के अनुसार हैबियस कॉर्पस केस, विधि के शासन को स्थापित करता है। यह मामला डायसी के नियम के तीसरे सिद्धांत को लागू करता है। इस मामले में कानूनी सवाल यह था कि क्या विधि के संवैधानिक शासन के ऊपर कोई विधि नहीं है? भारत में जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के बारे में संविधान के अनुच्छेद 21 के अलावा कोई विधि है? न्यायाधीशों ने माना कि संविधान विधि के शासन का जनादेश है। वे मानते हैं कि विधि के संवैधानिक शासन के अलावा कोई और विधि नहीं हो सकता । नैतिक विवेक को छोड़कर, उन्होंने माना कि कोई भी संविधान या संविधान के बाद का नियम नहीं हो सकता है।
अनुच्छेद 21 हमारे जीवन और स्वतंत्रता के बारे में विधि का नियम है। अनुच्छेद 21 कहता है कि “किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा प्रस्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन और वैयक्तिक स्वायत्तता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।"
एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला विवाद के अंतर्गत न्यायमूर्ति एच आर खन्ना ने कहा कि 'विधि का शासन मनमानी का विरोधी है विधि का शासन अब सभी सभ्य समाजों का स्वीकृत रूप .... हर जगह इसकी पहचान व्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ की जाती है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था की विरोधी धारणाओं के बीच संतुलन बनाए रखना चाहता है।
हर राज्य में जनहित की आवश्यकताओं के साथ मानवाधिकारों के मेल-मिलाप की समस्या उत्पन्न होती है। इस तरह के सामंजस्य को केवल स्वतंत्र अदालतों के अस्तित्व द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जो नागरिक और राज्य के बीच संतुलन बनाए रख सकते हैं और सरकारों को विधि के अनुरूप बनाने के लिए मजबूर कर सकते हैं।' संविधान ( चालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 में यह प्रावधान है कि आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 और 21 को निलंबित नहीं किया जाएगा।
भारत में आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System in India)
आपराधिक न्याय प्रणाली का तत् समाज में कानून और व्यवस्था को बनाये रखने के उपयोग आता है। यह अपराध को नियंत्रित करने के लिए सामाजिक नियंत्रण बनाए रखने और कानूनों का उल्लंघन करने वालों को आपराधिक दंड देने को सुनिश्चित करते हैं।
यह एक ज्ञात तथ्य है कि इस दुनिया के हर देश का अपना कानूनी तंत्र है, जिसका उद्देश्य एक ऐसे राष्ट्र के लिए है, जिसके निवासी किसी भी तरह के अपराध को कारित करने से डरे । सुरक्षित जीवन और सुसंस्कृत समाज को बढ़ावा देना इसका सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
एक कानूनी प्रणाली कुछ अधिकारों को मान्यता देती है, लोगों के लिए कर्तव्यों को निर्धारित करती है। और उन्हें लागू करने के साधन भी प्रदान करती है जो कानूनी प्रणाली इसे लागू करती है उसको लॉ एनफोर्सिंग मशीनरी कहा जाता है। इसमें न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं, पैरा कानूनी कर्मियों के साथ-साथ विभिन्न जांच एजेंसियां जैसे पुलिस, केंद्रीय जांच ब्यूरो, राज्यों के आपराधिक जांच विभाग और कई अन्य निवारक और प्रवर्तन एजेंसियां शामिल हैं।
साथ में यह व्यवस्था अपराध और अपराधियों का मुकाबला करने में मदद करती है। आम तौर पर जब कोई अपराध होता है, तो उस क्षेत्राधिकार का पुलिस विभाग जिसमें अपराध हुआ है, दोषियों को विधि के अनुसार दंड दिलवाने का कार्य करती है।
लेकिन ऐसी भी परिस्थितियां होती हैं जिनमें बहुत ही जटिल प्रकृति के अपराधों और ऐसे मुद्दे जो बड़े जनहित से जुड़े हैं, जिनकी जांच जटिल होती है। ऐसे मामलों में, या तो पुलिस विभाग स्वयं संज्ञान ले या फिर जाँच विधि सुस्पष्ट जांच एजेंसियों को सौंप दी जाती है। ऐसी परिस्थिति में मामले को विशेष जांच एजेंसियों को सौपने की आवश्यकता होती हैं।
विशेष जांच एजेंसियों को एक विशेष कानूनी ढांचे में काम करना पड़ता है, जिसमें भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC), साक्ष्य अधिनियम और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (1973 (CrPC)) और अन्य विशेष अधिनियम सम्मिलित रूप से कार्य करते है। विशेष जांच एजेंसियों को कानूनी ढांचे के रूप में जानी जाने वाली व्यवस्था को सम्मिलित करना होता हैं। यदि अत्यंत सावधानी के साथ कोई कदम नहीं उठाया जाता है, तो ऐसी परस्थिति में कानूनी सरंचना के दुरुपयोग की सम्भावना होती है और इसके दुष्परिणाम भी हो सकते हैं।
ऐतिहासिक रूप से भारत में आपराधिक न्याय प्रणाली तीन हजार वर्षों में विकसित हुई है। प्रारंभ में, यह प्रणाली वेदों और धर्म पर आधारित थी। प्राचीन भारत में राजा सर्वोच्च माना जाता था, जिसमें कोई विधायी शक्ति नहीं थी।
लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति बदल गई और राजा ने रीति-रिवाजों और स्थानीय उपयोगों को ध्यान में रखते हुए विधि और नियम बनाने शुरू कर दिए। प्राचीन भारत के दौरान दंड क्रूर, बर्बर और अमानवीय था। जैसा कि दंडों की प्रक्रिया और मात्रा के संबंध में विभिन्न स्मारकों में और कुछ मामलों में एक मनुस्मृति में पाए गए प्रावधानों के बीच भी विरोधाभास है। वर्ण (वर्ग) के आधार पर दंड देने की प्रणाली प्रचलित थी । विभिन्न कानूनी साहित्य में दंड और विरोधाभासी प्रावधानों को भड़काने की भेदभावपूर्ण व्यवस्था ने आपराधिक न्याय प्रणाली को दोषपूर्ण और भ्रमित कर दिया।
भारत में मुस्लिम शासन के दौरान हालांकि शेरशाह सूरी और अकबर जैसे प्रबुद्ध सम्राट निष्पक्ष रूप से न्याय करने के लिए बहुत उत्साह दिखाते थे, फिर भी भारत में मुस्लिम काल के दौरान न्याय प्रणाली धर्म पर आधारित थी। मुस्लिम और गैर-मुस्लिम में भेद किया जाता था।
एक लोकतांत्रिक देश में संविधान लोगों को कुछ बुनियादी अधिकारों और स्वतंत्रता की गारंटी देता है जबकि आपराधिक न्याय का प्रशासन कानूनों को लागू करने और अपराधियों को दंडित करके उनकी रक्षा करता है। भारत में न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के अपने लक्ष्य के प्रति संविधान को आगे बढ़ाने के लिए सरकार के सभी घटकों के सामंजस्यपूर्ण प्रयास आवश्यक हैं।
अपराधिक न्याय प्रणाली के घटक (Components of Criminal Justice System)
आपराधिक न्याय प्रणाली में कई घटक होते हैं जो इसकी प्रणाली बनाते हैं। पुलिस, सुधार, और अदालत सभी भूमिका निभाते हैं और सबसे सम्मानजनक और कार्यात्मक आपराधिक न्याय प्रणाली को बनाए रखने की कोशिश में एक साथ कार्य करते हैं।
एक प्रणाली जहां प्रत्येक अपनी भूमिका निभाने के बारे में अपने स्वयं के निर्णयों का उपयोग करता है। प्रत्येक का विचार इस बात से भिन्न हो सकता है कि अदालत प्रणाली कैसे काम करती है और यह स्वतंत्र है। कई कारक उस तरह भूमिका निभा सकते हैं जिस तरह से ये लोग वास्तविक अदालत प्रणाली की प्रक्रिया पर महसूस करते हैं। ऐसे कारक जहां वे सिस्टम भीतर काम करते हैं, अगर वे न्यायाधीश, पुलिस, वकील या सामाजिक सेवा अधिकारी हैं, तो वे सिस्टम के काम करने के तरीके को बदल सकते हैं। जहां वे भौगोलिक रूप से काम करते हैं, वहां के कारक और उन क्षेत्रों के दृष्टिकोण और राय भी व्यक्ति के सिस्टम के बारे में महसूस करने के तरीके को आकार दे सकते हैं।
आपराधिक न्याय प्रणाली चार घटकों से मिलकर बनी-
वे समाज में अपराध नियंत्रण के विभिन्न पहलुओं से निपटते हैं। वे इस प्रकार हैं-
अभियोजन (Prosecution)
विधि की विविधता समाज में व्यवहार के मापदंडों को चित्रित करते हैं और समाज की धारणाओं और जरूरतों के अनुसार अपराध को परिभाषित करते हैं। व प्रक्रिया को निर्धारित करते हैं। घटना के सत्यापन के लिए, जांच की जाती है। अपराध निर्धारित करने की प्रक्रिया, अपराध की प्रकृति और सजा की मात्रा के साथ। पुलिस अदालत में चालान पेश करती है। अदालत की कार्यवाही में अपराधी को कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार; एक त्वरित परीक्षण का अधिकार, कार्यवाही के संबंध में सूचित किए जाने का अधिकार और सुनवाई का अधिकार निहित है। चूंकि, जाँच अधिकारी के माध्यम से ही अदालत में मामले जाते हैं। कुछ मामलारें में पीड़ित स्वयं भी सीधे अदालत में जा सकता है। अभियोजन का कार्य पुलिस की जांच के बाद से शुरू होता है और अपराधी को सजा दिलाने या केस की पूरी कार्यवाही तक रहता है।
विधि लागू करवाना (Law Enforcement )
विधि लागू करने वाला अर्थात पुलिस सर्वप्रथम अपराधी व आपराधिक न्याय प्रणाली के साथ संपर्क करता है जो आमतौर पर पुलिस के पास होता है विधि लागू करने वाले कारित अपराध की जांच करते हैं और अपराधी की गिरफ्तारी करते हैं। कानूनों को लागू करने के लिए सभी समाजों में एक पुलिस सेवा है। जो प्राथमिक विधि प्रवर्तन एजेंसी है उन पर समाज में शांति बनाए रखने का दायित्व है। पुलिस का प्रमुख कार्य सबूत एकत्र करना है।
न्यायिक सहायक विधि प्रवर्तन अधिकारी (वकील) कानूनी कर्तव्यों का निर्वाह करता है जैसे कि रिपोर्ट किए गए अपराध की जांच करने वाली एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र के भीतर अपराध की रिपोर्ट प्राप्त करना और प्रलेखित करना; अपराधी व सरकार की कोर्ट में पैरवी करना ।
न्यायपालिका (Judiciary)
यह संविधान के रक्षक के रूप में कार्य करता है और यह सुनिश्चित करती है कि राज्य के सभी अंग समान हों। यह उस स्थान के रूप में कार्य करती है जहां विवादों का निपटारा किया जाता है और न्याय दिलाया जाता है। यह पता लगाना और निर्धारित करना है कि विधि का उल्लंघन अदालतों का कार्य सुलभ व त्वरित न्याय प्रदान करना है।
सुधारात्मक शासन प्रबंध (Corrective Governance)
यह विंग (जेल) न्यायपालिका द्वारा दी गई सजा को पूरा करता है। आरोपी के दोषी पाए जाने के बाद अपराधियों को अदालत प्रणाली से सुधारक अधिकारियों को सौंप दिया जाता है। सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, अपराधियों का उत्पीड़न उन्हें सामान्य आबादी से दूर करता है और आगे के अपराधों को समाप्त करने की उनकी क्षमता का विकास करता है। वास्तव में, जेल की सजा का नया लक्ष्य अपराधियों को पुनर्वास का मौका देना है।
आपराधिक न्याय प्रणाली की अवधारणा को अपनाया है प्रयास किया जाता है कि 'उचित प्रक्रिया', की जाये ताकि मनमानी को रोका जा सके। इस प्रक्रिया के तहत सभी को निर्दोष माना जाता है। जब तक कि अपराध साबित नहीं होता है। विधि की नजर में सभी समान हैं और निष्पक्ष और आरोपी को उसकी बेगुनाही साबित करने के लिए उचित अवसर दिया जाता है।
एक अन्य पहलू आपराधिक न्याय प्रणाली
जेल सुधार की शाखा है। यह वह जगह है जहां लोग गिरफ्तारी के समय जाते हैं और जहां न्यायाधीश निगरानी देंगे, तीनों का मतलब अलग-अलग चीजें हैं तीनों का मतलब है कि आप एक परिवेक्षक अधिकारी की निगरानी में होंगे। परिवेक्षक अधिकारी अपराधी से मिलेंगे या उनके साथ किसी तरह का संपर्क करें। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि अपराधी सजा का पालन करता है और अगर उल्लंघन कर सकता तो न्यायाधीश के सामने कठोर दंड के लिए वापस भेज सकता है।
भारतीय इतिहास के हर चरण में शासकों ने आपराधिक न्याय प्रणाली के विकास में योगदान दिया। हालाँकि उनमें से अधिकांश ने आपराधिक न्याय प्रणाली को अपने अधिकारों की रक्षा करने के बजाय जनता को अधीन करने के लिए एक साधन के रूप में अधिक व्यवहार किया। ब्रिटिश शासक जिन्होंने भारत में एक ध्वनि और अच्छी तरह से परिभाषित आपराधिक न्याय प्रणाली की स्थापना के लिए अच्छी तरह से सोचा था, वे भी इस कमजोरी से मुक्त नहीं थे। उन्होंने भारत में औपनिवेशिक शासन को बनाए रखने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक देखा और लोगों के लिए निष्पक्ष आपराधिक प्रशासन के लिए कम आपराधिक न्याय प्रणाली का मुख्य उद्देश्य सामाजिक सद्भाव बनाना और कानूनों को लागू करने और उनके उल्लंघन पर अंकुश लगाकर व्यवस्था बनाए रखना है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पुलिस, बार, न्यायपालिका और सुधारक सेवाओं से युक्त एक नेटवर्क आपराधिक न्याय प्रणाली का गठन करता है। चूंकि आपराधिक विधि पूरे आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए बुनियादी ढांचा प्रदान करता है इसलिए इसे भी माना जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
ब्रिटिशर्स ने अपनी कॉलोनियों में तथाकथित 'लॉ कॉन्सेप्ट का नियम' लागू किया, न कि न्याय देने के उद्देश्य से बल्कि दमनकारी कानूनों को पास करके उपनिवेशों को बर्बाद करने के लिए किया। यही कारण है कि अंग्रेजों के किसी भी उपनिवेश में 'रूल ऑफ लॉ' उम्मीद के अनुरूप विकसित नहीं हो पाया था। मूलत: आधीन उपनिवेश में रहने वाले लोग विधि की अवधारणा के नियम से पूरी तरह अनभिज्ञ थे, लेकिन उस सिद्धांत में हेरफेर किया गया। यह उत्पीड़न के साधन के रूप में उपयोग किया गया है। विधि प्रणाली इसके दुरुपयोग के लिए पर्याप्त जगह प्रदान करती है।
हमारे संवैधानिक निर्माता इस तथ्य को समझे बिना और पश्चिमी प्रयोगों पर निर्भर होने के कारण, विधि का शासन स्वीकार किया, और इंग्लैंड की संसदीय प्रणाली अपनायी । पश्चिमी कानूनी प्रणाली की नकल करने के बजाय, यदि उन्होंने हमारी अपनी कानूनी प्रणाली को धारण कर लिया होता, जो मध्ययुग अस्तित्व में थी, जो कि 12 शताब्दी से पहले थी, तो उन्होंने इस देश को एक अद्भुत संविधान दिया होता।
ब्रितानियों ने सोचा कि भारतीय सभ्यता पर हावी होने का एक तरीका विदेशी शिक्षा प्रणाली का लागू करना है। 'हमारे संवैधानिक निर्माता हमारे अपने अनुभवों, समाज सुधारकों तक पहुंच में विफल रहे थे। गांधी हमेशा इस तथ्य से अवगत थे और जो ) लगातार चेतावनी देने का कार्य करते हैं, और वह उस प्राचीन कानूनी प्रणाली को स्थापित करना चाहते थे। पश्चिमी विचारधारा से उबरने के लिए उनके प्रयास भी अपर्याप्त साबित हुए। भारत की स्वतंत्रता महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए संघर्ष के परिणामस्वरूप हुई । यदि हम एक स्वतंत्र राष्ट्र बने रहना चाहते हैं, तो हमारे पास आंतरिक आध्यात्मिक संसाधन होना चाहिए - एक विश्वास, व एक विचारधारा - जो हमें राष्ट्रीय भलाई के लिए खुद को स्थानांतरित करने में सक्षम बनाएगी, 'सामान्य विधि, प्राकृतिक विधि और प्राकृतिक न्याय के नियमों की पश्चिमी अवधारणा को बाहरी प्रभाव के रूप में माना जाता है। '
भारतीय मानस के एक हिस्से के रूप में हम यह नहीं दिखाते हैं कि विधि का शासन एक अवधारणा है जिसे माना जा सकता है। 'नानी पालकीवाला के ये शब्द हम सभी के लिए आंखें खोलने वाले होने चाहिए, आज हम जिन भी समस्याओं से जूझ रहे हैं, वे हमारी अपनी गलती का नतीजा हैं, हमें इसके साथ अपना विधि स्थापित करना होगा वस्तुतः हमें प्राचीन नियम विधि के साथ मौजूदा 'विधि शासन' को समेटना चाहिए।
आज हम अनुभव कर रहे हैं कि हमारे सांसद और विधायक विधि निर्माता होने के लिए अयोग्य हैं, यह समस्या मनु के समय में भी विद्यमान थी, जो इस विचार के थे कि न तो राजा या उनके मंत्री ही विधि बनाएंगे, केवल पाँच या सात जानकारों ने इसे माना। वेदों में नियम विधि की रूपरेखा होनी चाहिए। राजा और उनके मंत्रियों द्वारा उन नियमों का पालन किया जाना चाहिए। हम स्वीकार करेंगे कि राष्ट्रपति प्रणाली भारत में अच्छी नहीं हो सकती है, यहां तक कि संसदीय प्रणाली में भी कार्यपालिका और विधायिका के पूर्ण अलगाव की गुंजाइश है, विधायिका का यह पूर्ण अलगाव और कानूनी ज्ञान हमारे संविधान की रक्षा करता है। निरन्तर न्याय व शासन प्रक्रिया में कई बदलाव अनुभव किये जा रहे है आपसी तालमेल के आभाव के कारण यह वास्तव में बहुत सारी बुराइयाँ पैदा कर रहा है, जैसे कि अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग, न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति को प्रभावित करना, कानूनों के साथ विधि बनाना । इन सबसे ऊपर हम अपनी शिक्षा प्रणाली को फिर से बनाते हैं जिसके बिना किसी भी नए बदलाव की शुरुआत नहीं होगी।
पश्चिमी विचारों का अध्ययन करने से हमारी युवा पीढ़ी के दिमाग में हेरफेर होता है क्योंकि वे अभी भी सोचते हैं कि हमारी सांस्कृतिक प्रथा पश्चिम से काफी नीची है, वे सोचते हैं कि हमें पश्चिम की तरह कपड़े पहनना चाहिए, खाना पश्चिम की तरह, और पश्चिम की तरह रहते हैं, लेकिन हम भूल जाते हैं कि भारत के लोग हजार साल से दुनिया के मागदर्शक रहे हैं। हम पूरी दुनिया के लिए ज्ञान के स्रोत थे, हमारा विज्ञान, कला अपने आप में अद्वितीय था। यह नकारात्मक प्रवृत्ति हमारी शिक्षा प्रणाली के कारण है, हमें उन्हें अपने राष्ट्र और उसके सामर्थ्य के बारे में गर्व की भावना पैदा करनी चाहिए। आज हमारे छात्रों का कैरियर उनके शैक्षणिक प्रदर्शन पर निर्भर करता है; यह तथ्य उन्हें पाठ्य पुस्तकों तक सीमित रखने के लिए मजबूर करता है, जो पश्चिमी विचारों का एक गुच्छा सा प्रतीत होता हैं।
'विधि का शासन' अपने आप में एक अंत नहीं है, यह एक अंत का साधन है, न्याय प्रदान करने का साधन लोगों के विश्वासों के साथ सुसंगत होना चाहिए, हम पूरी तरह से उन पर एक विदेशी प्रणाली लागू नहीं कर सकते हैं, इसके लिए यह आवश्यक है। संस्थानिक पंचायत प्रणाली को वैधानिक मान्यता देने के लिए समय की जरूरत है, अगर ऐसा किया जाता है, तो कम से कम 50% से अधिक मामलों को विधि की अदालतों से संपर्क किए बिना लोगों द्वारा हल किया जाएगा, इससे मौजूदा विधि न्यायालयों का बोझ कम होगा। अतः निरन्तर समय, परिस्थिति, तथ्य और आवश्यकतानुसार बदलाव जरुरी होते है ।